कला में भारतीय दर्शन

मुझे प्रसन्नता है कि बौद्धिक जीवंतता और मन की परस्पर क्रिया को फिर से जीवंत करने के लिए एक नई पहल संस्कृति नैमिष्य की शुरूआत की गई है जो गोमती नदी के तट पर स्थित नैमिष वन से सम्बंधित है। देश के उत्कृष्ट विद्वान् वहाँ शिक्षा-दीक्षा के लिए एकत्रित हुआ करते थे। समाज में जब कभी सामाजिक या धार्मिक संकट आता था, तब नैमिष सभा बुलाई जाती थी जिसमें साधु संतों को बुलाया जाता था।
नैमिष से इतिहास का जो ज्ञान होता था और समाज को सशक्त बनाने वाले दिशानिर्देश सामने आते थे, वे देश की पूरी आबादी को राह दिखाने वाले प्रकाश की भूमिका निभाते थे। आज, जब समाज अनेक संकटों का सामना कर रहा है, तब स्थिति का आकलन करने के लिए आवश्यक है कि जानकार और स्वतंत्र सोच वाले एकजुट हां।

कुछ लोगों के बीच इस प्रकार के प्रयासों को पुनरुत्थानवादी या आत्म मुखर कहा जाता है लेकिन इसे दूसरे छोर पर जाकर देखने की आवश्यकता है। आदत के अनुसार हिंदुओं ने स्वयं-उन्मूलन और नकारात्मकतावाद पर इतने लंबे समय तक हमला किया है कि असंतुलन में सुधार की एकदम छोटी सी कोशिश भी अब अधिक मुखरता प्रतीत होती है।
आत्म-रक्षा पर काफी परिश्रम किया जा चुका है। हमें अब आगे बढ़ जाना चाहिए। ज्ञानकर्मियों के रूप में, हमें समान अवसरों के लिए अपने प्रयासों को तेज करना चाहिए। शुरूआत में, इस तरह की वापसी के लिए इस देश को लेकर बोले जाने वाले झूठ की एक स्पष्ट और गहरी समझ होनी चाहिए।

कला और संस्कृति को संस्कृति नैमिष्य के प्रमुख क्षेत्रों के रूप में बताया गया है। भारतीय परंपरा में, सौन्दर्य की किसी भी उपासना को दार्शनिक क्षेत्र की आधारशिला से पूरी तरह से अलग नहीं किया जा सकता है। सौन्दर्य के क्षेत्र में हमें जो विकृतियाँ देखने को मिलती हैं, उनके मूल में वह क्षरण है जो दर्शन की अवधारणाओं में प्रवेश कर गया है।

कला का व्यवसायीकरण तथा इसी प्रकार की अन्य विकृतियाँ दार्शनिक धारा में निरंतरता के अभाव के परिणाम हैं। संभवतः इस प्रकार की अन्य विकृतियाँ जिस हद तक प्लास्टिक कला में दिखती हैं उतनी शास्त्रीय संगीत में नहीं दिखती हैं।

हिंदू मन का औपनिवेशीकरण अक्सर चर्चा में रहने वाला विषय है जिस पर ज्यादा कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। अभी के लिए एक हल्का सा पिछला संदर्भ देना पर्याप्त होगा, जिसका उद्देश्य सिर्फ संस्कृति नैमिष्य को संदर्भित करना है।

किसी को भी बिना विद्वेष यह स्वीकार करना चाहिए कि अठारहवीं सदी के मध्य के बाद संस्कृत सम्बंधी अध्ययनों के प्रति दिलचस्पी जगाने में यूरोपीय विद्वानों का योगदान रहा है। उनका योगदान कुछ अच्छा कुछ बुरा के लिहाज से, अच्छा ही रहा है। उनमें से कुछ को हिंदू धर्म और दर्शन के स्वभाव की पृष्ठभूमि की जानकारी नहीं थी, जबकि कुछ में ऐसी प्रेरणा थी जो विद्वत्ता के साथ मेल नहीं खा रही थी।
कुछ असाधारण और सम्मानजनक अपवादों के साथ, अधिकांश यूरोपीय विद्वान लगभग पूरी तरह से भाषा विज्ञान और दर्शन पर आश्रित थे। व्याकरण और दर्शन हमारी परंपरा में शास्त्रीय व्याख्या के राजमहल में सिर्फ प्रवेश द्वारों के समान हैं। संस्कृत परंपरा से परिचित न होने की समस्या ईसाई मत को लेकर पक्षपात से और गंभीर हो गई।

इस प्रकार, शास्त्रों में लिखे अक्षरों का महत्व उन शब्दों के पीछे की भावना पर हावी हो गया। इसका परिणाम ऊटपटांग तिथि निर्धारण के रूप में भी सामने आया। उदाहरण के लिए, पाणिनी को जिस काल का बताया गया, उन्हें इस दलील के आधार पर मनमाने ढंग से बदल दिया गया कि उस प्राचीन काल में किसी के पास इतना असाधारण ज्ञान होना संभव नहीं था।

यहाँ तक कि विंटरनिट्ज जैसे संस्कृति से भली-भाँति परिचित विद्वान भी इस प्रकार के पक्षपात से जकड़े थे। मैकाले और मैक्स मूलर को जिस विषम प्रेरणा ने प्रोत्साहित किया उसकी चर्चा अक्सर की जाती है लेकिन मोनियर विलियम्स और आॅक्सफोर्ड में संस्कृत के प्रोफेसर बोडेन जैसे अन्य लोग भी कम कपटी नहीं थे। कर्नल बोडेन ने प्रोफेसर बनने के लिए जो शर्त रखी थी उनके मुताबिक उनके द्वारा किए जाने वाले अनुवाद की सहायता से ब्रिटिश भारतीयों का धर्म परिवर्तन तेजी से ईसाई धर्म में कर सकें।

ईश्वर का शुक्रिया कि थ्योडोर गोल्डस्टकर जैसे कुछ अच्छे संस्कारों वाले विद्वान थे जिन्होंने बोत्लिंगक रोथ, वेबर और अन्य के द्वारा की जा रही खतरनाक मूर्खताओं का प्रभावी ढंग से पर्दाफाश किया। गोल्ड स्टकर ने उन्हें ‘संस्कृत दर्शन के सैटर्नेलिया’ कहा।

दर्शन से कुछ ज्यादा ही छेड़छाड़ ने वैदिक छंदों के अर्थ का अनर्थ कर दिया। अन्य विद्वानों के साथ ही, पी वी केन ने बताया कि कैसे पश्चिमी देशों के अनुवादक व्याकरण और तुलनात्मक दर्शन पर पूरी तरह से निर्भर होकर कुछ का कुछ अर्थ निकाल लेते थे।

फिरंगियों को इसकी जानकारी ही नहीं थी कि वैदिक और पारंपरिक संस्कृत में एक ही शब्द के विभिन्न संदर्भ हो सकते हैं। संदर्भ और उसके जुडे़ दर्शन की अज्ञानता दोहरा खतरा थी। कई पश्चिमी विद्वानों ने देसी पंडितों की मदद ली, जिनमें से अधिकांश को संस्कृत का सिर्फ ऊपरी ज्ञान प्राप्त था।
विवाह के संस्कार में ऋग्वेद के दसवें मंडल के पचासीवें सूक्त के एक छंद का उपयोग किया जाता है। यह स्त्री के जीवन में चार अवस्थाओं के विषय में बताता है-शिशु के रूप में, बालिका के रूप में, युवती के रूप में और परिपक्व स्त्री के रूप में। एचएच विल्सन ने इस छंद का अनुवाद करते हुए अर्थ निकाला कि वधु को एक के बाद एक, चार पति प्राप्त होते हैं। हम बस पाठकों पर तरस खा सकते हैं, जिन्हें संस्कृत का ज्ञान नहीं और वे इतने भयंकर अनुवाद को सच मान बैठते थे।

सच कहा जाए तो सिर्फ हिंदू धर्म ही इस प्रकार की लापरवाही का शिकार नहीं था। इसी प्रकार अन्यत्र भी कई धर्मों के साथ ऐसा ही हुआ। यह उपनिवेशवादी डकैती का साक्षात प्रमाण था। लेम्स लेगे द्वारा सैकरेड बुक्स आॅफ द ईस्ट में कनफ्यूसियस की रचनाओं के अनुवाद की चर्चा करते हुए लिन युटांग ने लिखा, ”शब्दशः अनुवाद को लेकर लेगे में ऐसा आकर्षण है मानो स्पष्टता की बजाए अपरिचित अज्ञानता ही सत्यनिष्ठा का प्रमाण है।“
उससे पहले के युग के यूरोपीय विद्वानों जैसे विलहेम वाॅन हमबोल्ट का दार्शनिक ज्ञान कहीं अधिक वास्तविक था लेकिन एशिया और भारत से सम्बंधित ज्ञान के युग का जब आरम्भ हुआ तो राजनीति और साम्राज्यवाद की ज़रूरते हावी हो गईं, जिसने मैक्स मूलर जैसों को महत्व दिया।
सुचारू रूप से चल रही स्थानीय प्रणालियों और सांस्कृतिक व्यवस्था की नींव हिलाए जाने, आर्थिक शोषण, प्राकृतिक संसाधनों की लूट और ऐसे ही अंधाधुंध हमलों की चर्चा अक्सर की जाती है। हालाँकि, हमें यह समझ लेना चाहिए कि इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला स्वयं ब्रिटिश साम्राज्य ही था।
जीवन के ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें कई पीढ़ियों तक की निरंतरता सामाजिक शक्ति की आवश्यक शर्त होती है। एक बार वह निरंतरता भंग हो जाती है तो घोर पतन हो जाता है। इसका एक उदाहरण शास्त्र सीखने की अनोखी मौखिक परंपरा ही हैै जो अब इस प्रकार खो चुकी है कि उसे फिर से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। एक बार सूत्र टूट जाता है तो इस प्रकार की विरासत को पुनर्जीवित करना या फिर से उसकी रचना करना असंभव हो जाता है।
इस प्रकार की शिक्षा का कमजोर पड़ जाना आधुनिकीकरण की साम्राज्यवादी योजना का सबसे भयंकर दुष्परिणाम है। जीवंत स्वदेशी बौद्धिक व्यवस्था का स्थान तुच्छ यूरोपीय प्रतिमानों ने ले लिया। विदेशी राजनीतिक बेड़ियों को उतार देने के सात दशक बाद भी विघटन की वही प्रक्रिया आज भी जारी है, जिसका श्रेय शाही सिंहासन पर बाद के दिनों में बैठने वालों की दासतापूर्ण मानसिकता को जाता है।

यदि यह सबकुछ सिर्फ इतिहास होता तो इसे दूर किया जा सकता था लेकिन बीमारी और भी गहरी है। उदाहरण के लिए, क्रिश्चियन लासेन और अन्य न जिस नस्लभेदी विरासत को छोड़ा वह महाभारत के अध्ययनों को भी प्रभावित करती रही। हमारे महाकाव्य हमारी सांस्कृतिक जड़ों के एक अनूठे, सबसे मूल्यवान और सदैव प्रवाहित होते रहने वाले स्त्रोत हैं और उन्हें देसी-विदेशी विचारधारा वाले और साक्षरतावादी हस्तक्षेपियों के द्वारा भरी गई विषाक्तता से मुक्त करना है।

आप सब बिना संदेह यह जानते हैं कि कुछ स्वदेशी लेखकों ने आधे-अधूरे पश्चिमी समाजशास्त्रीय औजारों की सहायता से महाभारत की चीर-फाड़ की है, जिससे काल्पनिक और विकृत सिद्धांत सामने आए हैं। उन विख्यात लेखकों के नामों की चर्चा करना आवश्यक नहीं है।
इस प्रकार संस्कृति नैमिष्य की भूमिका का स्पष्ट है।

विनाश सरल होता है, पुनः प्राप्त करना कष्टदायी और दुष्कर होता है। सिर्फ भावनात्मक कारणों से ही हम परंपरा को लेकर पक्षपात नहीं करते। हमारी परंपरा सिर्फ आनुवंशिक जानकारी नहीं है। यह ठोस आधार प्रदान करती है लेकिन प्रगतिशील विकास को सीमित नहीं करती।
ऐसी गतिशीलता इस कारण है क्योंकि परंपरा से हमारे समाज का सम्बंध जैविक, जटिल और अत्यधिक सूक्ष्म है क्योंकि इसका स्वरूप और नियंत्रण नियमों पर आधारित है, जिन्हें सामूहिक रूप से पुरूशास्त्र कहते हैं। इस प्रकार भौतिक से लेकर आध्यात्मिक तक अस्तित्व के विभिन्न स्तरों में स्पष्टता है।

गडमड अवधारणाओं के कारण सामाजिक, धार्मिक, दार्शनिक, आध्यात्मिक और रहस्यवादी क्षेत्रों के सम्बंध में विवाद और भ्रम पैदा हुए हैं। हिंदू एक साथ विभिन्न स्तरों और विभिन्न युगों में जीता है। एक सामान्य हिंदू के लिए महाकाव्य के चरित्र उन समकालीन व्यक्तियों से अधिक वास्तविक हैं, जिनके साथ वह वर्तमान में जी रहा है। इस जीवन-दर्शन को वैधता मिलनी चाहिए। हमारे दर्शन का मौलिक प्रतिमान इस संसार की बहुस्तरीय अवधारणा है।

वेदांत की अवधारणा के स्तर पर जहाँ पर्याप्त स्पष्टता है, वहीं आम लोगों तक इस बात को प्रभावी ढंग से पहुँचाने के लिए सुनकर आसानी से समझ आने वाले मुहावरे के रूप में बताया जाना चाहिए। समय की ऐसी माँग को संस्कृति नैमिष्य पूरा कर सकता है। समाज को उसकी जड़ो के साथ फिर से जोड़ना आवश्यक है। व्यक्तियों को प्राप्त ज्ञान से उत्कृष्ट ज्ञान तक जाने के योग्य बनाया ही जाना चाहिए। इससे अधिक रोमांचक या संतुष्टि देने वाला और कुछ नहीं हो सकता है।

परंपरा कोई समस्या नहीं बल्कि यह अंतिम सुख, उत्कृष्टता और समापन तक ले जाता है। परंपरा संरक्षक और हस्तांतरित करने वाली है और सभी इच्छुकों का स्वागत करती है। यदि इसकी इच्छा रखने वाला विनम्रता और अपेक्षित अनुशासन का दृष्टिकोण रखता है तो परंपरा एक गौरवशाली दायित्व निभाती है।

यदि हम हिंदू धर्म में फिर से जीवन का संचार करना चाहते हैं तो हमें अनेक औपनिवेशिक परतों से बाहर निकलने के कदम उठाने होंगे, जो अब तक बने हैं, चाहे आप इसे पुनरुत्थान या आत्मस्थापन कहें। हमें गैर-औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया को संस्कृति के मोर्चे पर और अधिक परिश्रम कर पूरा करना होगा। मुझे विश्वास है कि संस्कृति नैमिष्य उसी दिशा में एक पहल है।

और अब कुछ बातें कला पर हिंदू दृष्टिकोण के सम्बंध में। मैंने आरम्भ में ही कहा था कि भारतीय परंपरा में, सौन्दर्य की कामना दर्शन से जुड़ी हुई है। कला को अलग-थलग कर नहीं देखा जा सकता है, कला जीवन और संस्कृति का अभिन्न अंग है। जैसा संस्कृति, ज्ञान-प्रणालियों आदि के विषय में होता है, हिंदू कला को भी साम्राज्यवादी अभियान के अंतर्गत काफी तुच्छ बता दिया गया था। ‘आलोचकों का कहना था कि भारतीय स्थापत्य में एकता, स्ष्टता या उच्च कोटि की उत्कृष्टता का अभाव है, भारतीय रंगमंच में रचनात्मकता और कल्पना’ का अभाव है, शिव का नृत्य ‘मृत्यु या संहार का नृत्य है’, वगैरह, वगैरह। इसमें संदेह नहीं कि अपवाद स्वरूप कुछ विशेषज्ञ भी थे, जैसे एडमंड गिल्स, जिन्होंने कथकली की एक प्रस्तुति को देखने के बाद कहा, ”ऐसा लगता है कि पूर्वी रंगमंच से हम इतना कुछ सीख सकते हैं कि उसकी कोई सीमा नहीं है।“

अरबिंदो ने ”उस महान् पतन के कड़वे प्रभावों“ पर विस्तार से लिखा है ”जो अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में चरम पर पहुँच गया।“ उस युग को उन्होंनेे ”संध्या काल“ कहा है ”जिससे भारतीय विचार के अनुसार एक नए युग के चक्र का आरम्भ होना हैै“ रवींद्र नाथ टैगोर संभवतः एक नए युग की शुरूआत को सबसे अच्छी तरह प्रतिनिधित्व करते हैं।
अरबिंदो ने वास्तविक भारतीय कला की विशिष्ट प्रकृति के बारे में विस्तार से बात की हैः ”भारतीय सोच के अनुसार स्वरूप का अस्तित्व आत्मा के सृजन के सिवाय कहीं और नहीं है और यह आत्मा से ही अपने संपूर्ण अर्थ और मूल्य को प्राप्त करता है।“
”प्रत्येक रेखा, द्रव्यमान की व्यवस्था, रंग, आकार, मुद्रा, प्रत्येक भौतिक संकेत…. पहला और आखिरी संकेत होता है, जो अक्सर एक प्रतीक होता है जो अपने मुख्य कार्य के रूप में आध्यात्मिक भावना, विचार, छवि को सहारा देता है जो परिभाषित न किए जाने वाले से परे जाता है लेकिन उस आत्मा की अधिक शक्तिशाली और संवेदनशील सच्चाई होता है जिसने इन गतिविधियों को सौन्दर्यबोध वाले मन में जन्म दिया और महत्वपूर्ण आकारों में उन्हें साकार किया।“

यह बात मूर्तिकला, प्रतिमा और मंदिर वास्तुकला पर भी लागू होती है। अरबिंदो ने आगे कहाः ”…प्राचीन और मध्य कालीन भारत के स्थापत्य का स्थान कलात्मक उपलब्धि पर बहुत ऊँचा है। हमें इससे अधिक गहरी मंशा, विशाल हृदय, उपलब्धि का एक अधिक सुसंगत कौशल देखने को नहीं मिलता है। संपूर्ण मूर्तिकला निर्माण की दो सदियों का सुनिश्चित इतिहास भारत के लोगों के जीवन का एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण तथ्य है। इसका कारण लोगांे के धार्मिक और दार्शनिक तथा सौन्दर्य बोध वाले मन के बीच गहरा सम्बंध है।“

हमें पश्चिम-प्रेरित आधुनिकता की निस्सारता की चर्चा पर समय बर्बाद करने की आवश्यकता नहीं है। एक प्रतिष्ठित विचारक डाॅ मैस्त्रे ने निष्कर्ष स्वरूप कहा हैः ”आधुनिक संस्कृति का मार्ग मानवता से राष्ट्रीयता के माध्यम से वहशीपन तक जाता है।“
भारतीय संस्कृति इस लिहाज से वियोजक प्रकृति की है कि मानव जीवन और इसके कलात्मक व अन्य प्रयास मनुष्य और संसार के बीच सौहार्दपूर्ण सम्बंध पर आधारित हैं। हमारा सौन्दर्य बोध हमारे चारों ओर विद्यमान गौरवशाली प्रकृति और समस्त जीवन के परस्पर सम्बंध की उदात्तता से जागता है। हमारा सौन्दर्य बोध आध्यात्मिक अनुभव का वैभवशाली उच्च मार्ग है। इसी गतिशीलता के कारण इतनी समृद्धि और विविधता देखने को मिलती है।

विल डुरांट ने कहा था, ”हम शायद ही किसी अन्य देश के विषय में जानते हैं जहाँ कला की इतनी व्यापक विविधता है… भारत में बुने हर वस्त्र में एक सौन्दर्य है जो सिर्फ किसी अत्यंत प्राचीन और इतनी मूल प्रवृत्ति की कला से ही संभव है। “हमारे देश में कला के पैमाने उससे कहीं व्यापक थे जैसा कि आज हम सोचते हैं। पूरा जीवन ही कला थी। हमने कल्पना की तलाश में जिस परिप्रेक्ष्य को खो दिया था आज उसे फिर से प्राप्त करने की आवश्यकता है।

यह कोई संयोग नहीं कि मूल देवता, शिव नृत्य के देवता है और शिव का नृत्य विश्व की निरंतर गति का प्रतीक है। भावों या रासांे के व्यापक प्रकार से स्वयं को जोड़ कर, हम अपने ही संसार के स्वामी बन जाते हैं। यह प्रक्रिया सिर्फ अनुज्ञेय नहीं बल्कि अनुभवात्मक है।

चेतना के ही स्तर पर हमें रंग या विन्यास, स्थिरीकरण या आंदोलन, हवा या सूर्योदय, प्रवाह या तरंग, चुप्पी या ध्वनि, शब्दों या अंतर स्थानों के प्रति प्रतिक्रिया करनी पड़ती है। हमारा हृदय जब जागृत होता है, तब कला स्वयं को प्रस्तुत करती है। अस्थायी और अनन्त आपस में मिल जाते हैं। सभी प्रकार की महान् कला का लक्ष्य प्रतीकों की मध्यस्थता से प्रतिवादी की सहायता अपने स्वयं की खोज में करना होता है।
इस संदर्भ में हमें सिस्टर निवेदिता के अवलोकनों का स्मरण करने का लाभ मिल सकता है, जिन्होंने ग्यारह दशक पहले कला-समुदाय को हिंदू कला के प्राण तथा समय की माँग के सम्बंध में जागरूक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
निवेदिता का स्मरण करना इस कारण भी सार्थक है क्योंकि हमारा यह दायित्व बनता है कि हम उन्हें उनकी 150वीं जयंती पर श्रद्धांजलि दें। निवेदिता के शब्द यह भी संकेत देते हैं कि वह किस प्रकार हिंदूत्व की भावना से जुड़ी हुई थीं। यदि मैं इस प्रस्तुति का समापन कलाकारों को निवेदिता के संदेश से करूँ तो यह सबसे उपयुक्त समापन होगा।

”यदि किसी भारतीय पेंटिंग को वास्तव में भारतीय और सबसे महान् बनाया जाना है तो इसे भारतीय हृदय को छू लेने वाला होना चाहिए, किसी ऐसी भावना या विचार को प्रस्तुत करने वाला होना चाहिए जो परिचित या तत्काल समझने योग्य हो और फिर, सर्वोत्कृष्ट होने के लिए, दर्शक में रहस्योद्धाटन की एक निश्चिय भावना जागृत करनी चाहिए जिसमें उसे महारत है।“
”कला, तब एक आध्यात्मिक संदेश से भर जाती है-जो आज के भारत में, राष्ट्रीयता का संदेश है।“
”कला हमें एक व्यापक साझा अभिव्यक्ति का अवसर देती है और मातृभूमि के निर्माण, बल्कि इसके जागरण के लिए, इसका पुनर्जन्म अनिवार्य है।“
”विज्ञान, शिक्षा, उद्योग, व्यापार के समान ही, ”मातृभमि के पुनर्निर्माण के लिए“ न कि किसी अन्य लक्ष्य के लिए, कला का ही अनुसरण करना चाहिए।“

डाॅ. एस. आर. रामास्वामी

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