भारत की कला बहुत गहराइयों में ले जाती है। आदमी गहराइयों में उतरता चला जाता है, यह भारतीय कला की विशेषता है। भारत की कला भारतीय संस्कृति की वाहिका है। कला संस्कृति को लेकर चलती है। हमारे सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही खड़ा हो जाता है कि कला जिस संस्कृति को लेकर चलती है, वह संस्कृति क्या है? अंग्रेज़ी में हम लोग उसको कल्चर कहते हैं। कल्चर और संस्कृति दोनों समानार्थी नहीं हैं।
हमारी संस्कृति में अध्यात्म है और कल्चर अध्यात्म से कोसों दूर है। कल्चर का मतलब है, जो सुसभ्य है, अच्छे से कपड़े पहनता है, अच्छे से बोलता है, अच्छे से व्यवहार करता है, आने वाले लोगों को अच्छे से बैठाता है, वेल बिहेव्ड है, वेल मैनर्ड है। इसको हम वेल कल्चर्ड बोलते हैं। इसका संस्कृति से कुछ लेना-देना नहीं है।
कल्चर बाह्य रूप है, संस्कृति आंतरिक है। हो सकता है, कोई वेल कल्चर्ड हो और सुसंस्कृत नहीं हो लेकिन जो सुसंस्कृत है, वह वेल कल्चर्ड होगा ही। हमारे यहाँ परिभाषाएँ अलग हैं। हो सकता है, रामकृष्ण परमहंस को वेल कल्चर्ड कहें या नहीं लेकिन वे सुसंस्कृत हैं। वे सैकड़ों सुसंस्कृत लोगों को गढ़ सकते हैं। हमारी संस्कृति का मूलाधार, आत्मा क्या है? हम जिसे कहते हैं कि सुसंस्कृत है तो उसमें शुचिता चाहिए, पवित्रता चाहिए, प्रामाणिकता चाहिए। सत्य के प्रति निष्ठा चाहिए। जिसमें ये संस्कार हैं, वह सुसंस्कृत है लेकिन कल्चर में संस्कारों की आवश्यकता नहीं पड़ती।
तो सबसे पहली बात है कि जो सुसंस्कृत है, वह इन गुणों वाला होना चाहिए। सत्यनिष्ठ, प्रामाणिक, शुचितापूर्ण, क्षमावान, धैर्यवान। धर्मज्ञ जो है, वह ही सुसंस्कृत है। विशेष बात यह है कि कल्चर और संस्कृति में जो पर्याप्त भेद है, उसको अपने को ध्यान में रखना चाहिए।

 सभ्यता और संस्कृति

बहुत से लोगों के मन में भ्रम हो जाता है। सिविलाइजेशन और संस्कृति, सभ्यता और संस्कृति में क्या घालमेल है, यह समझ में नहीं आता। वास्तव में हमारी कला सभ्यता के साथ-साथ चलती है लेकिन संस्कृति को लेकर चलती है। हमारी कला सभ्यता की सहयोगिनी है लेकिन संस्कृति को कंधे पर बैठाए हुए लेकर चलती है।
अब प्रश्न यह है कि सभ्यता क्या है? सभ्यता का केंद्रबिंदु है विज्ञान, अर्थ और बाजार। जैसे-जैसे विज्ञान नए-नए आविष्कार करता है, वैसे-वैसे इन आविष्कारों के अनुसार व्यापारी नए-नए सामान मार्केट में उतार देता है। नया-नया सामान मार्केट में आता है तो हम खरीदते हैं। समाज उसका उपयोग करता है और सभ्यता आगे बढ़ती है। यानी सभ्यता का कंेद्रबिंदु विज्ञान, अर्थ और बाजार है। सभ्यता नए वस्त्र देती है, नए मकान देती है, नई सड़क देती है, नए वाहन देती है, विद्यालय के भवन देती है, तरह-तरह के माध्यम देती है, तरह-तरह के औजार देती है, तरह-तरह की मशीनें देती है, कारखाने देती है। यह सब सभ्यता देती है।

संस्कृति अलग चीज है। संस्कृति का केंद्रबिंदु अलग है। संस्कृति का केंद्रबिंदु जो है, वह भारत में अध्यात्म है। भारत की संस्कृति अध्यात्म को लेकर चलती है। भोजन कैसे करना है, यह ज़रूर सभ्यता तय कर सकती है। आप पत्तल में भोजन कीजिए, मेज पर कीजिए, खड़े होकर कीजिए, बफर में कीजिए। कुछ और तरीके निकल सकते हैं। यह सिविलाइजेशन तय करेगी।
सभ्यता अन्न का उत्पादन बढ़ा सकती है। सभ्यता तमाम आविष्कार कर सकती है, ढेर सारा अन्न पैदा कर सकती है लेकिन भोजन और अन्न के प्रति दृष्टिकोण क्या हो, यह संस्कृति तय करेगी। संस्कृति कहती है-अन्न ब्रह्म। भोजन की थाली ईश्वर का प्रसाद है। इसे बिगाड़ना नहीं, पैर के नीचे पड़ने नहीं देना।
भूखे के लिए भोजन देने की बात संस्कृति तय करेगी। भोजन की दृष्टि संस्कृति तय करेगी, भोजन का विस्तार सभ्यता तय करेगी। नए-नए इंस्ट्रूमेंट लाना सभ्यता तय करेगी, बजाना क्या है, यह संस्कृति तय करेगी। नए-नए वस्त्र पैदा करने का काम सभ्यता करेगी, वस्त्र कैसा पहनना है, यह संस्कृति तय करेगी। दोनों चीजों का अंतर समझिए। संस्कृति हज़ारों वर्षों में आती है और हज़ारों वर्षों तक टिकती है। जन्म-जन्मांतर तक चलती है। जन्म से लेकर अंत तक साथ नहीं छोड़ती, उसका नाम संस्कृति है।
मुझे नाम मिला कृष्ण गोपाल। क्यों मिला, क्योंकि संस्कृति है। मेरे माता-पिता, पड़ोसियों या समाज के लोगों को कृष्ण से लगाव होगा। हज़ारों साल से ये नाम चले आ रहे हैं, यह संस्कृति तय करती है। जैसे फूल में सुगंध है, दूध में मक्खन है। दिखता नहीं लेकिन है। उसकी अनुभूति होती है। यह संस्कृति का मर्म है।

हमारे संस्कारों की जो आधारभूमि है, वह अध्यात्म है। सिविलाइजेशन आधारभूमि नहीं है। जो हज़ारों साल से चले आ रहे हमारे तमाम काम हैं, उनके अन्दर जो बैठा है, उसका अधिष्ठान, वह अध्यात्म है। सभ्यताएँ आएँगी और चली जाएँगी।
कला इस संस्कृति के आध्यात्मिक भाव को लेकर चलती है। कला भावों को व्यक्त करती है। कला अपने अन्दर के भाव गीत में व्यक्त करेगी, नृत्य में व्यक्त करेगी, नाट्य में करेगी, शिल्प में करेगी, चित्र में करेगी। मन में जो है, उसको प्रकट करेगी। ये सब कला के भिन्न-भिन्न आयाम जो हमको दिखते हैं, भाव को व्यक्त करने के साधन हैं। भाव संस्कृति तय करेगी, भाव अध्यात्म तय करेगा।
साध्य क्या होगा? साध्य परमानंद होगा। जो साधक है कला का, उसके मन में सांस्कृतिक अधिष्ठान स्पष्ट है तो साधन वह कोई भी लेगा। वह चित्रकला का सहारा लेगा, नाट्य का लेगा, नृत्य का लेगा, भित्तिचित्र का लेगा अथवा मूर्ति बनाएगा। साधन भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। साधन कितने ही प्रकार के विकसित कर सकता है साधक लेकिन उसके अंतर्तम में जो अध्यात्म बैठा है, प्रकटीकरण उसका होता है।
इस तरह साधन, साध्य और साधक तीनों एकरूप हो जाते हैं तो साधना उत्कृष्ट होती चली जाती है। मीरा का साधन उसका तानपुरा है, गीत है। वह भजन, कविता लिखती है, गाती भी है। वाद्य भी है उसके पास, कंठ भी है। उसको कविता लिखने की भगवान् ने क्षमता दी है।
साधना करते-करते कृष्ण के साथ एकरूप हो जाने का उसका अपना निर्णय है। मीरा अपने साधनों से साधना करते-करते एक ऐसा स्थान पाती है कि आज भी कालजयी दिखती है। कला व्यक्ति को कालजयी बना देती है, यदि उसके अन्दर वह अध्यात्म तत्त्व है।

जो आनन्द लाए-वह कला

कला आई कहाँ से? कला शब्द कहाँ से आया? असल में कला शब्द की व्युत्पत्ति आनन्द लातिक्ति कला, यानी जिससे आनन्द आता है। आनन्द भौतिक नहीं है। यह ऊपर से दिखने वाला तो थोड़ी देर रहता है लेकिन धीरे-धीरे आनन्द जब अंतर्मन में आता है तो बात दूसरी हो जाती है। हृदय को जो स्पंदन है, भावनाओं को हृत्तंत्री जो है, वह जो ध्वनि होती है, तभी होती है जब मनुष्य कहीं-न-कहीं एकात्मबोध में आ जाता है। जब वह एकाकार होने लगता है, तब उसका आनन्द का रस बढ़ता ही जाता है।
साधना किसी भी साधन से कराइए, यह गौण चीज है लेकिन जो साधन है, वह अव्यक्त को व्यक्त कर देता है। जो अदृश्य है, उसको दृश्य कर देता है, जो अकथ्य है, उसको कथ्य में बदल देता है, क्योंकि उसके अंतर्मन में वह उतरता है। उन साधनों के माध्यम से जो दिखता नहीं, वह दृश्य उसके कैनवास पर आता है। जो कभी बोला नहीं गया, वह उसके कंठ से निकलता है। जो अदृश्य था, वह दृश्य हो गया, जो अश्रव्य था, श्रव्य हो गया, जो अकथ्य था, वह कथ्य हो गया।
कलाकार अपनी साधना से भिन्न-भिन्न आयाम देता चलता है। ऐसा करने में उसको आंनद आता है। आत्मिक संतोष मिलता है। वह चार घंटा, छह घंटा चित्र बनाता रहता है, अभ्यास करता रहता है। एक छोटी बैठक में मैंने एक उदाहरण रखा था कि वाराणसी में रीवा कोेठी गंगा के किनारेः काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रावास में प्रातःकाल संगीत के विद्यार्थी अभ्यास करते हैं, तीन घंटे-चार घंटे। क्या मिलता है? इतनी मेहनत करें तो कहीं सलेक्शन हो जाए उनका। दो-चार-पाँच लाख की नौकरी मिल जाए लेकिन नहीं, ये तो साधना करते हैं।
कई-कई घंटे साधना करने के बाद आर्थिक उन्नति क्या होगी, मालूम नहीं। असल में मन को जो आनन्द मिलता है, उसका कोई मूल्य नहीं होता। कई बार लोगों को लगता है कि इतनी मेहनत करने के बाद क्या मिलता है। मिलेगा कुछ नहीं, केवल आत्मा को संतोष और आत्मानन्द बस।
जो व्यक्ति शरीर से परिश्रम करता है, मेहनत करता है, उसको मजदूर कहते हैं और बुद्धि लगाकर जो काम करता है, वह कारीगर हो जाता है। इंजीनियर भी कारीगर है, सर्जन भी कारीगर ही है। बुद्धि की प्रतिभा अच्छी है लेकिन जो इसके साथ अपना हृदय लगा देता है, वह कलाकार बनता है। मजदूरी और कारीगरी से ऊपर है कला। ‘विद्यानां शिल्पनैपुण्यम्’।
कितनी भी डिग्री प्राप्त करने वाली परीक्षा पास कर लीजिए। बी.ए., एम.ए., बी.टेक., एम.टेक., एम.सी.एच., एम.डी., कुछ भी कीजिए। एक निपुणता प्राप्त की आपने विशेष प्रकार की और कुछ नहीं लेकिन कला में हृदय है, इसके अन्दर भावनाएँ हैं, संवेदनाएँ हैं। इस स्तर पर आकर कला धीरे-धीरे अपना स्थान पाती है और अपूर्णता को एक पूर्णता देती है। एक रिक्तता को समाप्त करती है।
कला का मतलब ही है कि कोई चीज रिक्त थी, वह पूरी हुई। उसको पूरा करता है कलाकार। वह उसको बनाता है, उसको गाता है, उसको स्वर देता है। अपूर्ण को पूर्ण करता है, रिक्त को भर देता है। मैथिलीशरण गुप्त चार पंक्ति बोलते हैं कि जो अपूर्ण है, कला उसी की पूर्ति है-

हो राह है जो जहाँ सो हो रहा,
यदि वही हमने कहा तो क्या कहा,
किंतु होना चाहिए, कब क्या कहा,
व्यक्त करती है कला ही यह यहाँ।

नाट्य और कला

भारत की कला के बारे में मैथिलीशरण गुप्त कह रहे हैं कि जो हो रहा है, वही आप कर रहे हैं, इसमें क्या विशेष किया, किंतु जो होना चाहिए, वह आपने किया तो वास्तव में कला ही इसको अभिव्यक्त करती है। भारत में कला का इतिहास कहाँ से प्रारम्भ होता है? वैसे कला वेदों से ही शुरू होती है, इसमें कोई दो राय नहीं है।
समय के साथ कला के अच्छे शास्त्र आ गए। उसकी अच्छी कहानी भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में दी है। लंबी कहानी है, बहुत छोटे में आपको बताता हूँ। कथा है कि स्वर्ग में भी संकट आ गया। क्यों? इसलिए कि स्वर्ग में सब साधन थे। भोग के, उपभोग के सारे साधन स्वर्ग में थे तो रजोगुण बढ़ता चला गया तो ईष्र्या, द्वेष, मद, मत्सर भी बढ़ते ही चले गए।
जब रजोगुण बढ़ता है तो ये सब भी बढ़ते हैं। देवता दुःखी हो गए, ब्रह्माजी के पास आए। क्या करें? देवताओं ने सोचा कि ब्रह्माजी दृश्य व श्रव्य कुछ नाटक की रचना करें, क्रीड़ा करें तो उससे यह वातावरण सुधर जाएगा। लोगों में संस्कार आ जाएगा। ऐसी इच्छा रखकर देवतागण इंद्र के साथ ब्रह्माजी के पास पहुँचे।
ब्रह्माजी ने कहा कि ठीक है, करते हैं कुछ रचना। रचना की तो चारों वेदों से कुछ-न-कुछ लिया। ऋग्वेद से पाठ ले लिया, सामवेद से गीत ले लिया, यजुर्वेद से अभिनय लिया, अथर्ववेद से रस लिया। फिर एक बड़े नाट्यशास्त्र का निर्माण किया और भरत मुनि को दे दिया। बड़ी रोचक बात उसमें है।
देवताओं ने कहा कि यह हमारे यहाँ संभव नहीं है, देवता लोग नाटक नहीं कर सकते। यह तो कलाकार ही कर सकते हैं। क्यों? क्योेंकि देवता लोग आलसी हो गए हैं। कला साधना चाहती है। साधना करना इनके बस का नहीं है।
सोचिए कि कितनी प्रामाणिकता से उन्होंने स्वीकार कर लिया लेकिन जो नाट्यशास्त्र बना, उसके बहुत सारे गुण हैं। मैं समझता हूँ, भारत के इतिहास में यह बहुत बड़ा है। बहुत सुन्दर शास्त्र है। कहा गया है कि इस नाट्यशास्त्र में जो-जो भाग लेंगे, उनमें कोई भेद नहीं होगा। कोई छोटा है या बड़ा, संपन्न है या विपन्न, इससे फर्क नहीं पड़ेगा।
इस जाति का या उस जाति का, इस प्रांत का या उस प्रांत का, कोई भी भेद नहीं माना जाएगा। ‘कला’ कला है। पहली बात कि कला भेद नहीं मानती, सारे भेद में अभेद की सृष्टि करती है। दूसरी बात कि जो आएगा, उसको साधना करनी पड़ेगी, कला साधना चाहती है। तीसरी बात कि यह केवल विषय मात्र नहीं है अर्थात् किसी भी पात्र को कोई भी हमने यदि काम, जिसे आजकल रोल बोलते हैं, दे दिया तो नाराज़ नहीं होना है उसको।
कथा कुछ यों हैै कि नाट्यशास्त्र का मंचन शुरू हुआ तो असुरों और देवताओं का संघर्ष मंचन करना था। असुरों को असुरों का काम दे दिया, देवताओं को देवताओं का काम दे दिया। इसमें असुरों को हारना ही था। बेचारे मंच पर भी हार गए। असल में हारे, नाटक में भी हार गए तो ब्रह्माजी के पास गए। बोले-ब्रह्माजी, हमारी दुर्गति क्यांे कराते हैं आप? तो ब्रह्माजी ने कहा-नहीं-नहीं, नाटक में कोई हार-जीत नहीं होती। तब से चला आ रहा है कि नाटक में पराजय नहीं होती।
ब्रह्माजी कहते हैं कि नाटक में जो पात्र हैं, वे नाटक तक ही हैं, यह ध्यान रखना और नाट्यशास्त्र का काम है समाज में भेद को समाप्त करना, एकाग्रचित्त होकर लंबी, दीर्घ साधना करने का मन बनाना और जो भी भूमिका मिले, उसके अनुसार अभिनय करना। वे आगे बढ़ते हैं और कहते हैं कि स्वर्ग में जो नाट्य की आवश्यकता हुई, वह इसीलिए हुई कि भोग व विलास इतना बढ़ गया कि नींद तक नहीं आती, विश्रान्ति नहीं होती।
वे कहते हैं कि इस नाट्य में नृत्य है, कला भी है, चित्र भी है, सबकुछ है तो जिनको विश्रान्ति नहीं मिलती, उनको विश्रान्ति मिलेगी। ‘विश्रान्ति जनमं काले नाट्यमेतद् भविष्यति’। जिनको नींद नहीं आती, उनको नींद आ जाएगी। जिसको अपनी रूचि का जो चाहिए, उसको वह सब नाट्य में मिल जाएगा। संस्कार, विचार जैसा सबकुछ मिल जाएगा। विशेष बात यह कि यह नाट्य आध्यात्मिक उन्नति के लिए है। केवल भौतिक उन्नति हो गई, यह पर्याप्त नहीं है।
भरत मुनि लिख रहे हैं- स्वर्ग में भी नाट्य की आवश्यकता है, भले ही वहाँ भौतिक उन्नति बहुत है। वास्तव में भौतिक उन्नति पर्याप्त नहीं है। भौतिक उन्नति के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति के लिए नाट्य की भी आवश्यकता है। यह कला आध्यात्मिक उन्नति के लिए है। धर्म के सत्य मार्ग का दर्शन कला के माध्यम से होगा। समाज आनन्द पाएगा। समाज में आनन्द की प्रणाली विकसित हो जाए, यह महत्त्वपूर्ण है।
इसके अलावा जो लोगों को उचित दिशा-निर्देश देने होते हैं, कई बार वे बड़ी कठोर भाषा में हो जाते हैं। ‘ये ऐसा क्यों किया? ऐसा कीजिए, ऐसा नहीं’ वगैरह। कर्कश भाषा में बोलना अच्छा नहीं है। नाट्य में मधुर भाषा में, सुंदर दृश्य में चीजें प्रस्तुत की जाती हैं। उसको लोग बुरा नहीं मानते उसको सीख जाते हैं इसलिए नाट्य सब दृष्टि से परिवर्तन का एक अच्छा साधन बन जाता है।
नाट्य जो लोकमत है, लोकमन है, उसको ध्यान में रखता है। जो लोकसिद्धि है, यह उसको प्राप्त करने का साधन है। लोकमन को ध्यान में रखकर, लोकधर्म को ध्यान में रखकर लोकसिद्धि प्राप्त करना नाट्य और कला का बड़ा उद्देश्य है। लोकभाव को ध्यान में रखना ज़रूरी है, अतः जैसा समाज है, उस समाज के मनोभाव को ध्यान में रखकर कला आगे बढ़ती है लेकिन कला का उद्देश्य पक्का है-
लोकमंगल, लोकहित, लोकमन का सम्मान, लोकभावों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना और इस प्रकार से इस कला ने भिन्न-भिन्न प्रकार से इस समाज के आध्यात्मिक उन्नति के भाव को, लोकधर्म
को, लोक आदर्शों को फिर से लोगांे के मन में स्थापित करने का कार्य किया। कला का उद्देश्य यही है-लोगांे की आत्मा विशद हो जाए। लोगों का मन विस्तीर्ण हो जाए। लोगों की सहनशक्ति बढ़ जाए। सारे भेदों के बीच भी मेल और सामज्ंास्य करने की प्रवृत्ति बन जाए।

कला और कलाकार

कलाकार की जो कल्पनाशीलता है, वह बहुत व्यापक होती है, अद्भुत होती है। कल्पनाशीलता के आधार पर कलाकार साक्षात्कार करता है। किसी भी कलाकार को कोई भी भूमिका दे दी गई तो सबसे पहला काम यह है, उसको जो भूमिका मिली है, उस भूमिका के साथ उसे एकरूप होना पड़ता है।
भूमिका कुछ भी मिली, भरत की मिली, राम की मिली, हनुमान की मिली, खर-दूषण की मिल गई हो या किसी की भी मिली हो तो जो भूमिका मिली है, कलाकार उसके साथ एकाकार होने की कोशिश करता है। असली पात्र कैसे बोलता है, कैसे चलता है, कैसे बैठता है, कैसे विचार करता है-इन सारी बातों का अध्ययन करते-करते वैसा ही होने की कोशिश करता है। वैसा ही हो जाता है तो श्रेष्ठ कलाकार हो जाता है, अर्थात् पहले तो अहं निकल जाता है।
‘मैं कौन हूँ’ का भाव समाप्त हो गया। अन्दर एक दूसरा पात्र आ गया। इतना एकात्म भाव साधना के ही काम से हो सकता है। बड़ी साधना। एक कदम और आगे बढ़ जाता है व्यक्ति कि उसका अहं निकल जाता है। अहं निकलते ही वह समष्टि के साथ परमात्मा के साथ मिलने के लिए तैयार हो जाता है। उसको ध्यान में आता है कि ‘मैं जो हूँ’ और ‘ये’, दोनों एक ही हैं। मैं और ये परमात्मा से मिलकर दो नहीं हैं, एक ही हैं।
ऐसा करते-करते कलाकार उस सत्य में जीता है, उस सौन्दर्य में जीता है, उस शिव के रूप में जीता है। ऐसा करते-करते कलाकार देखता है कि मैं पूरी तरह वैसा ही हो गया। मान लीजिए कि उसको जुआरी का पात्र मिल गया। वह समझता है कि वह बिल्कुल वही है तो उसमें उसको अनिर्वचनीय सुख मिलता है।
आजादी की लड़ाई के समय की बात है। बंबई में एक नाटक हो रहा था। नाटक में ही एक पात्र ने एक महिला के साथ दुव्र्यवहार शुरू कर दिया। लोकमान्य तिलक उसको देख रहे थे। अचानक बेंत लेकर उठकर आ गए और उसको मारने लगे। तुरंत उसने लोकमान्य तिलकजी का पैर पकड़ लिया और बोला-महाराज, मैं सफल हो गया, यह तो नाटक था।
लोकमान्य तिलक भूल गए कि यह नाटक है। लोकमान्य तिलक को लगा कि यह वास्तविकता में हो रहा है। ऐसे में यह कैसे हो सकता है कि वे बैठे देखते रहें। उस कलाकार को जो आनन्द मिला, वह ऐसा अद्भुत आनन्द है कि वह कलाकार स्वयं एक स्रष्टा बन जाता है। कलाकार ने वह रूप रख लिया तो यह अध्यात्म साधना है लेकिन यह छोटी बात नहीं है।

नृत्य और नृथ्य

कलाकार हर एक पात्र के साथ एकरूप होता चलता है। कल्पना कीजिए, द्रौपदी की भूमिका मिल गई और वह द्रौपदी बन गया। कैकेयी का पात्र मिल गया तो कैकेयी बन गया। धीरे-धीरे उसका अहंकार निकल जाता है। यह आध्यात्मिक साधना है, सामान्य चीज नहीं है। उसमें डूबते जाना है।
हर हाल में एक मौलिक बात पक्की है कि कलाकार कोई भी हो, उसकी साधना का मूल उद्देश्य एक ही है, और वह है अध्यात्म। इसीलिए स्कंद पुराण में कहा गया है-कोई भी कला का स्वरूप हो, गीत है, नाट्य है, वाद्य है, नृत्य है या कोई भी है, अंत में ध्यान रखना है कि वह विष्णु का स्मरण ही है। गीतं वाद्यं च नृत्यं च नाट्यं विष्णु कथां मुनिः।
तुम चाहे नृत्य करो, गीत गाओ, चाहे कुछ भी करो, किंतु ध्यान में रखो कि वह अंततोगत्वा ईश्वर की साधना का ही रूप बन जाए। जो ऐसा करता है, साधना में लीन हो जाता है, वह सच में पुण्यात्मा हो जाता है। छत्तीस तत्त्वों में एक तत्त्व कला है। यह कला शिव के साथ है। जब शिव निद्रा में से अर्थात् शान्त भाव से उठते हैं, निष्क्रिय भाव से शिव उठते हैं तो शिव के साथ के साथ में ललिता महामाया के रूप में सक्रिय हो जाती है इसलिए हम लोग कहते हैं, यह ललित कला ललिता से है।
यह शिव के साथ है। यह शिव की चिर लीला सखी है। चिर इसके चिन्मय साथी हैं। दोनों मिल करके सृष्टि की रचना करते हैं तो यह आनन्दमय है। खेल-खेल में सारी सृष्टि की रचना हो रही है, यह ध्यान में रखने की बात है। यह ईश्वर का खेल है-‘क्रीडा ते लोकरचना’। यह लोकरचना हो रही है लेकिन ‘सखा ते चिन्मय शिव’। शिव चिन्मय सखा के रूप में भाग ले रहे हैं लेकिन इस लोकरचना में आनन्द है।
‘आहारस्ते सदानन्दो भासस्ते हृदयं शताम्’।…और ऐसा करते-करते आनन्द हो रहा है। शिव और शिव के साथ ललिता, ये दोनांे मिलकर कर रहे हैं। सारी सृष्टि की रचना चल रही है। दो बातें इसमें बहुत सुंदर हैं। शिव नृत्यकर्ता हैं और शिव के साथ जो ललिता है, वह लास्य करती है, नृत्य करती है। थोड़ा-सा अंतर है। एक नृत्य है, एक नृत है।
शिव का नृत्य जो है, उसमें आनन्द हैं। उसमें भावना है। उसमें हृदय है। यह बुद्धि का काम नहीं है। जो नृत्य है, बुद्धि के और ऊपर है, दोनों साथ-साथ चलते हैं। एक कर्म-शक्ति है, जो निर्माण के कार्य में लीन है। एक लास्य है, वह आनन्द में डूबा हुआ है।
दोनों का साथ-साथ मिलन साथ-साथ संचालन होता रहता है। जैसे हम लोग कह सकते हैं कि खेत में बैल चलता है और बैलों के गले में घंटी है। घंटी बजती है तो बैल झूम-झूमकर चलता रहता है। बैल को भी नहीं लगता कि परिश्रम हो रहा है।
खेत में महिला बीज बोती है या चक्की पीसती है, कोई छोटा-मोटा काम करती है और कोई गीत गुनगुनाती चल रही है। श्रम है लेकिन लास्य भी है। उसको परेशानी अनुभव नहीं होती। टैक्सी का ड्राइवर है, वह आठ-आठ घंटे आँखें फाड़कर टैक्सी चलाता है लेकिन ट्रांजिस्टर लगाकर गाना सुन रहा है तो प्रसन्न है, मगन होकर गाड़ी चला रहा है। घंटों गाड़ी चलाता है। गाना सुन करके, कोई भजन सुन करके चला रहा है।
ये दोनों साथ हो जाते हैं तो जीवन आनन्दमय हो जाता है। नृत्य-नृत का संगम। भारत के मनीषियों ने सृष्टि के खेल का जो वर्णन किया है, अद्भुत है। बच्चों को सिखाते हैं, छोटा अ, बड़ा आ, छोटी इ, बड़ी ई लेकिन जब हम उसको सिखाते हैं अ से अनार, आ से आम तो वह देखता है, खुश होता है। खेल-खेल में जल्दी सीख जाता है। यह क्या है छोटा अ, बड़ा आ नृत्य है। हमने अ से अनार, आ से आम सिखाया, यह लास्य है।
भाव कहने का यह है कि जीवन में नृत्य तो रहेगा ही रहेगा, काम तो रहेगा ही रहेगा, पर क्या इस काम को लास्य के साथ, आनन्द के साथ कर सकते हैं। अगर ऐसा हमने किया तो कला इसके साथ-साथ चलती है और जीवन भर चलती है।
बड़े-बड़े वैज्ञानिक, आइंस्टीन जैसे लोग भी परेशान हो जाते हैं और आकर शाम को सितार, गिटार, प्यानो, कुछ-न-कुछ बजाने लगते हैं। वे बड़े साइंटिस्ट है लेकिन शांति नहीं है। खोज है, प्रसिद्धि है, शांति नहीं है। शांति के लिए संगीत चाहिए, शांति के लिए गायन चाहिए, शांति के लिए चित्र चाहिए, कोई कला चाहिए। कला मिल जाती है तो शांति मिल जाती है अर्थात् कला हृदय का काम, मन का काम है।
यह शिव का काम है। सारी सृष्टि में दोनों को साथ लेकर ही चला गया है। कला में दो भाग हैं-एक है कला का क्रिया पक्ष और एक है कला का ज्ञान पक्ष। क्रिया पक्ष दिखता है, ज्ञान पक्ष इसके अन्दर है। वेदों ने जो दिया है, दर्शन ने जो दिया है, वह ज्ञान है। जो दिखता है, जो कार्यक्रम हो रहा है, वह क्रिया है। क्रिया और ज्ञान, दोनों को मिलाकर ही कला का पूरा रूप बनता है।

कला और काव्य

हमारे यहाँ इस कला को वैदिक काल से ही स्थान दिया गया है। वैदिक ऋषियों ने इसको समझा कि जो अच्छा, सुंदर ज्ञान है, उसको कला के रूप में समझिए। इसीलिए वेद काव्य में आए। रामायण काव्य में आया, महाभारत काव्य में आया, गीता काव्य में आई, पुराण काव्य में आए। सब चीजें भारत में काव्य में आईं।
काव्य गाकर सुनाया गया। गाकर सुनाया तो अच्छा लगने लगा। काव्य मन में, स्मरणशक्ति में बैठ जाता है। वैदिक ऋषि दस हज़ार, पंद्रह हज़ार वर्ष पूर्व वैदिक ऋचाओं को गा-गाकर सुना रहे हैं और लोगों को आज तक याद हैं। क्यों, क्योंकि वह सब काव्य में था। टैक्स्ट में याद करना मुश्किल होता है।
हमारे देश का सारा साहित्य काव्य में आया, गायन में आया, वादन के साथ आया और इसीलिए स्थिर है आज। आज हम इन्हें सुरक्षित रूप में लेकर दसियों, बीसियों हज़ार साल बाद भी खड़े हैं। अपने तमाम सुंदर वाड्मय को लेकर आज भी हम चल रहे हैं, क्योंकि इसके साथ कला जुड़ी हुई है।
स्वर की स्मृति बहुत लंबी है। स्वर एक बार मन में बैठ गया तो बना रहता है। हमने कोई चार पंक्ति का टैक्स्ट दे दिया कि याद करके लाओ तो बहुत समय लगता है पर चार पंक्तियाँ गाकर बता दीं तो वे आसानी से याद हो जाती हैं। भारत में एक संुदर परंपरा प्रारम्भ काल से ही चली आ रही है कि जितना भी सुंदर साहित्य, दर्शन, विचार हो, सबको कला के साथ जोड़कर चलिए। कुछ वैसे ही जैसे शिव के साथ लास्य है।
वैदिक परंपरा से लेकर आज तक हम लोग देखते हैं कि हर सुंदर साहित्य किसी-न-किसी कला के रूप में लोकमन में बैठ जाता है। इसका सुंदर उदाहरण देखना है तो हमें बारहवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक भक्तिकाल के सारे संतों को देखना चाहिए। वे संत अपना कोई साहित्य लिखते हैं तो कला के साथ।
चाहे गुरू नानकदेव हों, चाहे नामदेव, तुकाराम हों, असम के शंकरदेव हों, सूरदास और मीराबाई हों, हज़ारों संत रहे हैं देश में, उन सबने कला का सहारा लिया। सबने अपने-अपने वचनों को एक स्वर में बाँध दिया। सबका कोई-न-कोई राग है। सब किसी-न-किसी वाद्य के साथ गाए जाते हैं। सारा-का-सारा समाज विद्वान् भले न होगा लेकिन कबीर के दोहे, मीरा के पद, सूर के भजन, तुलसी की चैपाइयाँ, नानक के शब्द गाए जाने के कारण याद हो गए।
इस मौलिक तत्त्व के ज्ञान को, गहन ज्ञान को नीचे तक हज़ारों-लाखों-करोड़ों लोगों के कंठ में उतारने का काम जो किया, वह कला ने ही तो किया। कला के कंधे पर बैठकर भक्ति आंदोलन पूरे देश में फैल गया। दुनिया भर में फैल गया। इसका श्रेय कला को है।
पाश्चात्य जगत् में यह नहीं था। उन्होंने कला को दुत्कार दिया या अपने साहित्य में कला को कोई प्रश्रय नहीं दिया। साहित्य तो आया लेकिन जिस तरह से हमारे यहाँ का व्यक्ति उसको सुंदर वाणी में गाता है, कंठ में लेकर बैठता है, वह भाव उनके यहाँ नहीं बना। उस भाव से वे दूर रहे। इसलिए भारत में जब कभी कोई ऐसी समस्या आई तो कला एकदम सामने आ गई।
कला ने उस समस्या का समाधान दे दिया। इस मौलिक तत्त्वज्ञान को, इस मौलिक दर्शन को हम बचाएँगे। उदाहरण के लिए मैं बताऊँ तो समझने की ज़रूरत है कि तुलसी ने मानस लिखने के बाद रख नहीं दिया। रख देते तो रखा ही रह जाता। उसको कला ने पकड़ लिया। बाबा ने उसको कला दी, गाना सिखाया। चैपाइयों को स्वर दिया, छंदों को अलग स्वर दिया। सोरठा अलग तरह से गाया गया। वाद्य अलग तरह से बजे, मंचन हुआ। पात्र आ गए, रामलीला शुरू हुई।
सारे देश में रामलीला, कम-से-कम उत्तर भारत में गाँव-गाँव में होने लगी। इसका श्रेय कला को है। कला के कंधे पर बैठकर पूरा का पूरा साहित्य दर्शन गाँव-गाँव चला गया और घोर अंधकार के समय, घोर निराशा के क्षणों में बाबा तुलसीदास हज़ारों कलाकारों को लेकर प्रस्तुत हो गए।
समाज के सब तरह के लोगों को साथ ले लेते थे। कोई छूत-अछूत नहीं, कोई छोटा-बड़ा नहीं। यह रावण की सेना है, यह राम की सेना है। सुग्रीव, नल-नील सब आ गए। कोई भी पात्र बनता है। चलो, इस बार तुम सुग्रीव बनो, अगली बार तुमको भरत बनाएँगे। हर जाति-बिरादरी को लेकर, वाद्यों को लेकर, गायकों को लेकर मंचन शुरू हुआ तो गूढ़ दर्शन जो था राम का, वेदों का, सब नीचे तक आ गया घर-परिवार के दर्शन जैसा।
घर-घर में राम जैसा। धर्म कैसा, राम जैसा। राम धर्मज्ञ हो गया। राम धर्मधुरीण हो गया, राम परिवार में आदर्श हो गया। जब मंचन हुआ तो लोगों ने मन से देखा, हृदय से देखा। कई बार रामलीला देखने चले जाते थे, देखते थे कि राम-सीता का वनवास हो रहा है। कल तो इनका राजतिलक होना तय था, आज वनवास हो रहा है। सीता ने सबका चरण स्पर्श किया है। सबके चरणों में सिर रखकर जैसे ही सीता कैकेयी के चरणों में सिर रखती हैं, पूरा-का-पूरा समाज रोने लगता है।
जो लोग रामलीला देख रहे हैं, सब रोने लगते हैं। क्यों? क्योंकि उनको लगता है कि यह ज़्यादती हो गई। हज़ारों साल पहले घटना घटी थी लेकिन कला ने उसको रूप दिया है, कला ने उसको भाव दिया है, कला ने उसको संवेदना दी है। कला ने इस भाव को लोगों के मन में इतना गहरा उतार दिया कि लोगों को लगने लगा कि सीता हमारी हैं, राम हमारे हैं; भरत, लक्ष्मण, हनुमान हमारे हैं। यह विचार-दर्शन लोगों के मन में बैठ गया।
यह है कला का यश, कला का दर्शन, कला का मर्म, कला का धर्म। मिश्र में भी बहुत कहानियाँ हैं। राम कोई ऐतिहासिक पुरूष नहीं हैं। राम मर्यादा पुरूषोत्तम लोगों के हृदय में विराजमान ऐसे व्यक्ति हैं, जो हट नहीं सकते, क्योंकि कला उसको जीवित रखती है। बहुत सी कहानियाँ हैं, मिश्र में, ग्रीक में, रोम में, पर्सिया मे लेकिन उन्हें कोई नहीं सुनता। किसी कहानी का मंचन कहीं नहीं होता। कोई याद नहीं करता, कोई देखकर रोता भी नहीं है।
हाँ, रामायण होती है तब लोग रोने लगते हैं, भागवत होती है तब लोग रोने लगते हैं, क्योंकि समाँ ऐसा बँधता है। दर्शन तो गूढ़ होता है, नीरस होता है। दर्शन सरस नहीं होता लेकिन कला उस गूढ़, नीरस दर्शन को सरस बनाकर लोगों के हृदय में कैसे बैठा देती है, यह अद्भुत है।
मैंने प्रारम्भ में ही कहा कि कला संस्कृति के अन्दर बैठा जो अध्यात्म रूपी दर्शन है, उसको अपने कंधे पर लेकर चलती है। लोगों के हृदय में जब तक नहीं बैठा देती, तब तक कला सफल नहीं है। कला चरित्र के उत्थान की सबसे सरल विद्या है। चरित्र-उत्थान कैसे होता है, यह कला सिखाती है।

नाटक का भाव

छोटे-छोटे नाटक, छोटी-छोटी कविताएँ, छोटे-छोटे प्रसंग अपने देश में हज़ारों साल से चले आ रहे हैं। दो वर्ष पूर्व मैं कर्नाटक में था। संघ शिक्षा वर्ग के एक शिविर की बात है। सांयकाल एक नाटक का मंचन हुआ-‘पुण्यकोटि गाय’। बहुत छोटा-सा नाटक। कहानी छोटी-सी, बहुत सरल।
एक गाय जंगल में गई। वहाँ एक सिंह उसको खाने को दौड़ता है। गाय कहती है कि भाई, हमको छोड़ दो, हमारा एक बच्चा है, उसको दूध पिलाकर हम फिर आ जाएँगे। सिंह कहता है कि नहीं आई तो! गाय कहती है कि नहीं, मैं आ जाऊँगी, वचन देकर जा रही हूँ। ज़रूर आ जाऊँगी। सिंह भरोसा कर लेता है। गाय चली जाती है और बच्चे को दूध पिलाती है।
दुबारा चलने से पहले सभी अपनों को बुलाकर कहती है, ‘हमको सिंह मिल गया था, हम जा रहे हैं। इसको दूध पिला दिया है, आगे से हमारे बच्चे की देखभाल तुम लोग करना।’ कुछ चतुर लोग कहते हैं कि छोड़ो, सिंह यहाँ थोड़े ही आएगा। गाय कहती है कि नहीं, हमने वचन दिया है तो हम जाएँगे। गाय चली जाती है तो सिंह फिर मिल जाता है उसको।
सिंह ने पूछा, कैसे क्या हुआ, किस्सा सुना। तो गाय कहती है, ‘मैंने बच्चे को दूध पिलाया, अब बच्चे को मैं सबको सौंपकर आ गई हूँ। अब आप मुझे खा सकते हैं।’ सिंह का मन भी एकदम बदल गया। सिंह भी करूणा में डूब गया, ऐसा उस नाटक का सार है। रोचक है कि जो उस नाटक का मंचन करते हैं, छोटे-छोटे बच्चे हैं, पात्र हैं, सब शांत हो जाते हैं।
गाय जो सबको प्रवचन देकर जाती है कि सत्य से हिलना नहीं, डिगना नहीं तो लोगों को भी लगता है कि हाँ, सत्य से नहीं हिलना, नहीं डिगना। सत्य को लोगों के मन में बैठाने के लिए ही ‘पुण्यकोटि गाय’ नाटक रचा गया। कर्नाटक में इतना प्रचलित है, इतना रोचक है ‘पुण्यकोटि गाय’ कि बच्चा-बच्चा समझ जाता है। छोटे-छोटे बालकों के मन में कोमल संस्कार रहता है। ऐसे नाटक से दूरगामी परिणाम निकलता है। जीवन भर यह संस्कार हिलता नहीं।
गांधीजी ने ‘हरिश्चंद्र’’ नाटक देखा तो देखिए कि कैसे सत्य पर टिके रहे, जीवन भी नहीं भूले। तो कला चरित्र के उत्थान में ऐसी भूमिका निभाती है, ऐसा वातावरण निर्माण करती है कि लोगों के मन में बैठा भाव स्थायी हो जाता है।
कलाकार सामने कोई दृश्य देखता है, मन में किसी दृश्य की कल्पना करता है तो उसके अन्दर की जो प्रज्ञा है, अंतर्बोध है, इंट्यूशन है, उस कल्पना से उसे जीता है। उसके साथ एकाकार हो जाता है। उस आॅब्जेक्ट के साथ एकात्म हो जाता है और फिर अनेक प्रकार से विचार करता है। जितना वह गहराई में डूबता जाता है तो चाहे वह गीत लिखे, नाटक लिखे या और कुछ भी हो, आगे बढ़ता है। उसमें जी करके वह जो आनन्द पाता है, उसी को लोगों तक पहुँचाना चाहता है। अपनी कल्पना का चित्र जब तक लोगों के मन में नहीं उतार देता, उसको लगता है कि सफलता नहीं मिली।
कलाकार एक इंट्यूशन करते-करते उसे अपने अन्दर ले जाता है। यहाँ लाते-लाते वहाँ ले जाता है। यह एकात्मबोध की प्रक्रिया बड़ी मजबूत प्रक्रिया है। यह कलाकार के बस का ही काम है। पश्चिमी जगत् में बाहर से व्यक्ति देखता है। कोई मूर्ति है कितनी सुंदर है, वह आकलन करता है। उसका विश्लेषण रूप, रंग देखकर करता है। मुख्य रूप से आकृति देखता है।
भारत में उल्टा होता है। भारतीय कलाकार अन्दर देखता है पहले। अन्दर देखकर उसके अन्दर के भावों से उसका मूल्यांकन करता है। भारत में क्या होता है कि मानो किसी ने बुद्ध देखा तो बुद्ध कैसा है, यह महत्त्व की बात नहीं है। बुद्ध को देखते ही उसके मन में भाव जगता है-बुद्ध क्या है, बुद्ध कैसा है। बुद्ध का सारा जीवन उसके मन में उतरता चलता है और जैसा बुद्ध था, वैसा भाव मन में बैठ गया। फिर बुद्ध की मूर्ति सुंदर नहीं भी होगी तो भी चलेगी। कोई दिक्कत नहीं है।
भारतीय जगत् की कला और पाश्चात्य जगत् की कला में यही अंतर है कि पाश्चात्य जगत् की कला में लोग बाहर से देखकर एक अनुमान करते हैं, भारत की कला में उसकी भावनाओं को देखकर निर्णय करते हैं। उसके इमोशंस में जाते हैं, उसकी स्पिरिट में जाते हैं। बाहर का रूप थोड़ा सुंदर नहीं भी होगा तो भी चलेगा।

पात्र और पात्रता

कलाकार को भरत मुनि ने पात्र कहा है। पात्र का एक दर्शन है। जिस पात्र में दूध रखा है, पात्र दूध का ही रूप ले लेता है। पात्र में जल रखा है तो जल का ही रूप ले लेता है। बात पात्र की है। पात्र का संस्कार शुचितापूर्ण हो, सत्यनिष्ठ हो, प्रामाणिक हो, साधनामय हो, यह आवश्यक है। वह भूमिका कौन सी कर रहा है, यह द्वितीय दर्जे की बात है। इसलिए यह पात्र जो है, इसकी साधना है।
हम कहते हैं, सबके अन्दर एक ब्रह्म है-काला, गोरा, राजा, रंक, सब ब्रह्म समान हैं, सबके अन्दर ब्रह्म है। बस बाहर की आकृति, बाहर की क्षमता भिन्न-भिन्न है। इसमें उल्टा है, पात्र समान है। कलाजगत् में पात्र के बारे में जो कहा गया है, वह अलग-अलग नहीं है। पात्र की शुचिता, सत्यनिष्ठा, प्रामाणिकता सबके लिए अलग-अलग नहीं, सबके लिए काॅमन है।
भूमिका क्या मिली, अभिनय क्या करता होगा, यह दूसरे दर्जे की बात है लेकिन असली बात है कि वह डूब गया उसमें, उसके अनुरूप ही हो गया। बस यह उसकी सफलता का सबसे बड़ा रहस्य है। अगर वह अपनी साधना से वैसा ही हो गया तो वह सफल है।
किसी फिल्म में के.एल. सहगल साहब को गाना गाना था। गाना सात-आठ बार हो गया। गाना थोड़ा दुःख का था। थोड़ा रोने का भाव था। डायरेक्टर बार-बार रिजेक्ट कर देते कि दुबारा गाओ। घंटे-आधा घंटे रूककर सहगल फिर गाते। आखिर सहगल साहब भी थोड़ा दुःखी हो गए कि कितनी बार गाऊँ। डायरेक्टर ने कहा कि नहीं, एक बार अच्छे से गाइए।
इस बार सहगल साहब ने सिर्फ गाया ही नहीं, बल्कि फूट-फूटकर रोने लगे। गाते-गाते ही रोने लगे और दूसरी तरफ रिकार्डिंग चलती रही। सहगल साहब की आँखें बन्द।
गाना खत्म हुआ तो डायरेक्टर ने उनको गले लगा लिया कि वाह भई, बहुत अच्छा गाया आपने। सहगल साहब को लगा कि अब तक कहाँ थे। भूल गए वे कि कहाँ थे। दरअसल, वे उसी पात्र में जाकर बैठ गए। उसी के साथ एकरूप हो गए। उनको लगा कि वह मैं ही हूँ। इसी में कलाकार की सफलता है। वह वैसा ही हो जाता है साधना करते-करते तो हम कहते हैं कि वह ब्रह्म के निकट आ गया है।
पाश्चात्य जगत् के बहुत से लोगों ने जब भारत पर आक्रमण किया तो भारत की कलाओं को भी देखा। हम मंदिर बनाते हैं, मंदिर की दीवारें बनती हैं। देश भर में मंदिर सौ तरीके से बनेगा लेकिन मंदिर एक ही होगा। वह शिव का मंदिर होगा, हनुमान का मंदिर होगा या देवी वगैरह का मंदिर होगा। मंदिर कोई भी हो, देवता कोई भी हो, उसका भाव एक ही होता है।
यानी ईश्वर के साथ साक्षात्कार करने का साधन है मंदिर। उसकी कलाकृतियाँ यही निर्देश करती हैं। कोई भित्तिचित्र है तो उस भित्तिचित्र के पीछे कल्पनालोक एक ही है। कोणार्क का सूर्य मंदिर देखिए, अजंता की गुफा देखिए, दक्षिण के मंदिर देखिए। उनमें उकेरी गई कलाकृतियों के पीछे जाएँगे, दीवारों के पीछे जाएँगे तो पता चलेगा कि अंततोगत्वा लक्ष्य एक ही है। उसमें चाहे शिव बैठे हों, विष्णु बैठे हों, वह सब गौण बात है।
मंदिर के पीछे की कल्पना एक है, कलाकार भिन्न-भिन्न प्रकार से उसे रूप देता है। बाहर के लोगों ने सोचा कि इसी में इनका धर्म है तो उन्होंने उसे तोड़ दिया लेकिन कला ने उनको तोड़ते देखकर रूप बदल लिया, क्योंकि उनमें आत्मा थोड़े ही थी। आत्मा तो लोगों के अन्दर भावना में थी। वे इन लोगों की भावना को नहीं तोड़ सके, जो फिर से मंदिर निर्माण करने के लिए तैयार रहती थी।
चाहे कितनी बार मंदिर तोड़ते गए लेकिन वह जो भावना बैठी थी, उसके चलते वे फिर से कलाकार को लेकर आते थे और नई कला से नया सृजन कर देते थे। मंदिर टूट गए, जाने दो, हम भजन करेंगे, कीर्तन करेंगे। कला कीर्तन के रूप में आ गई।
चैतन्य महाप्रभु ने झाँझ-मंजीरा ले लिया, मृदंग ले लिया। छोड़ो मंदिर, क्या रखा है मंदिर में! जाने दो, हमारा अध्यात्म तो हमारे हाथ में ही है। झाँझ-मंजीरा-मृदंग हमारे हाथ में हैं तो बिल्डिंग में क्या रखा है, छोड़ दो, जाने दो उसे।

कला परिवर्तनशील है

जैसे ही कोई संकट आता है, विपरीत परिस्थिति आती है, कला अपना मार्ग बदल देती है, दूसरा रूप ले लेती है। बड़ा मंदिर छोड़ दीजिए, छोटे ठाकुरजी घर में विराजमान हो जाते हैं। बड़े-बड़े सभागृह छोड़ दीजिए, हम छोटा-छोटा कार्यक्रम कर लेते हैं। भजन-कीर्तन घर में ही कर लेंगे। अब झाँझ-मृदंग घर-घर में आ गए। कला ने रूप बदल लिया।
हम देखते हैं कि बारहवीं शताब्दी से अठारहवीं शताब्दी तक कला ने कितने रूप बदले हैं। मंदिरों के शिल्प छूट गए। जब मंदिर रह नहीं सकते तो छोड़ दो और यह होते ही एकदम कला नए रूप में आ गई। बारहवीं शताब्दी के पहले भजन-कीर्तन कहीं नहीं दिखते। झाँझ-मंजीरा-मृदंग भी नहीं दिखते। कला की अपनी प्रकृति है, एकदम नए रूप में आती है। संकट में कौन-सा रूप रखना है, वह ले लेती है।
इस प्रकार जो सारे धर्म का नाश करने वाले थे, उनको भी समझ में आ गया कि धर्म का नाश, कला का नाश ऐसे नहीं होता। शब्द में प्राण नहीं होता, शब्द स्थूल होता है। जैसे ही शब्द को स्वर मिल जाता है, वह प्राणवान् हो जाता है। सामान्यतः कोई शब्द लिखा है, इसका कौन-सा भाव है, समझना मुश्किल है लेकिन जब गायक इसको गाना शुरू करता है और भिन्न-भिन्न विधाओें में गाता है, एक-दो शब्द को ही दसियों प्रकार से गाता है तो भाँति-भाँति की अर्थ-ध्वनियाँ निकलती हैं।
जैसे लिखा है, न जाओ….। ‘न जाओ’ में क्या है? विनय भी हो सकती है, आग्रह भी हो सकता है, जिद भी हो सकती है, हठ भी हो सकता है। नाराजगी हो सकती है, दुःख भी हो सकता है। गायक कैसे गाता है, उसके ऊपर निर्भर करता है। शब्द तो स्थिर है, स्थूल है लेकिन देखने की बात है कि गायक उसमें प्राण कैसे भरता है। ‘सखी श्याम नहीं आए’ डागर बंधुओं ने इसको गाया। देखिए कि कितने प्रकार से गाते हैं वे इसको।
सखी श्याम नहीं आए… इसमें आग्रह भी हो सकता है, दुःख भी हो सकता है, विरह हो सकती है, वेदना हो सकती है, क्षमा भी हो सकती है लेकिन कवि के गाने के ऊपर है कि कितने प्रकार से किन-किन भावों से वह गाता है। आप देखिए कि नीरस दिखनेवाला, स्थूल-सा शब्द जो है, उसको कवि कैसे प्राणवान् बना देता है।
तात्पर्य यह है कि कला एक विशेष प्रकार का रूप लेकर चलती है। कला विशेष प्रकार के युग में विशेष प्रकार का भाव लेकर चलती है। कला भारतीय मन में अध्यात्म को लेकर चलती है। पाश्चात्य जगत् की कला इस अध्यात्म से सामान्यतः बहुत दूर रहती है।
युग-युग के सत्य की जो खोज है, उस सत्य की खोज का नाम भारत में कला है। क्योंकि अध्यात्म तो निश्चित है। वह बड़ा नहीं है, वह विस्तीर्ण भी नहीं है लेकिन उस सारे-के-सारे अध्यात्म को एक स्वरूप देने का काम, उस अध्यात्म को एक रूप देने का काम कला करती है। वैसे आत्मा तो दिखती नहीं लेकिन रूप धरती है तो जीव दिखता है। अध्यात्म दिखता नहीं।
अध्यात्म साहित्य में है, टैक्स्ट में है तो नीरस दिखता है। पर सारी आध्यात्मिक जानकारियों को, आध्यात्मिक परंपराओं को, संवेदनाओं को, सारी सृष्टि को कला भिन्न-भिन्न रूप में ले चलती है। कला बताती है कि सारी प्रकृति, सृष्टि एक है। सबका एकात्मबोध करा देती है।

प्रकृति और कला

पांडिचेरी आश्रम में श्रीमाँ ने एक दिन मेज पर फूल सजा दिए और पूरे बारह घंटे घड़ी के बना दिए। बारह क्रमांकों पर कुछ फूल थे। एक, दो, तीन घड़ी बनाकर हर क्रमांक पर पाँच-पाँच, छह-छह फूल रख दिए और बच्चों को बुलाकर पूछा, बच्चों! यह क्या है? बच्चे समझ नहीं पाए। श्रीमाँ ने कहा, यह फूलघड़ी है। बच्चों ने पूछा, फूलघड़ी कैसे है माँ? माँ ने कहा, ‘देखो, ऐसा है कि एक बार लक्ष्मी आई थीं, उनको समय का ज्ञान नहीं होता था। वे भ्रम में पड़ गईं। क्या समय है, समझ में नहीं आता। तो तुरंत वनदेवी आईं और एक-एक फूल को बताया कि तुमको बारह बजे खिलना है, तुमको एक बजे, तुमको दो बजे। प्रातःकाल से लेकर पूरे चैबीस घंटे का बना दिया।’
अर्थात् हर फूल का एक समय है। प्रातः तीन बजे, चार बजे से लेकर, भोर से लेकर रात्रि तक खिलने का समय है।
श्रीमाँ ने प्रकृति को दिखाया, बच्चे आनन्द-विभोर हो गए। प्रकृति कितनी एकरूप है हमारे साथ। जब कोई बालक गंगा का चित्र बनाता है, गंगाघाट पर आने वाला आदमी एकरूप हो जाता है। पहाड़ अपने, जंगल अपने, सारी वनस्पतियाँ अपनी, जीव-जगत् अपना, सारी सृष्टि अपनी, सभी मनुष्य अपने ही हैं, यह बोध कराता है।
कभी गायन, कभी वादन कभी नृत्य, कभी मूर्ति, कभी भित्तिचित्र के माध्यम से कला अभिव्यक्ति देती है। विभाजन नहीं, द्वेष नहीं, घृणा नहीं, स्पर्धा नहीं। कला सद्गुणों की सृष्टि करती है इसलिए कला इस अध्यात्म को अपने साथ लेकर विचरण करती है तो वास्तव में धर्म की ही स्थापना करती है। इसलिए कला का अर्थ ही यही है, कला का भाव ही यही है। कला की आत्मा धर्म है, कला की आत्मा अध्यात्म है। यदि वह नहीं तो कला, कला नहीं।
नृत्य में अगर वह भाव नहीं है, जो मन के भावों को ऊँचा ले जाए तो उस नृत्य का क्या अर्थ है! जो भीतर की भावनाओं को ऊपर नहीं पहुँचाता, उसका क्या मतलब है! उन गीतों का क्या अर्थ है, जो संगीत मन में गहराइयाँ नहीं पैदा करते! उस संगीत का क्या अर्थ है। जो मन को और उदात्त नहीं बना देता! इसलिए यह कला मोद देती है, बोध भी देती है, ज्ञान और आनन्द भी देती है।
आनन्द और ज्ञान को साथ लेकर चलते हुए सारी सृष्टि का जो लोकमंगल देखे ओर उसी में रत रहे, वही कला है, वही कला का दर्शन है।

डाॅ. कृष्ण गोपाल

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