दिव्य नैमिषारण्य तीर्थ

संस्कृत वाड्.मय में नैमिषारण्य का उल्लेख एक ऐसे तीर्थ स्थान के रूप में किया गया है, जो पुण्य तीर्थ मोक्षदायक है।

नैमिषारण्य दो शब्दों से मिलकर बना है, नैमिष तथा अरण्य। सर्वप्रथम अरण्य शब्द पर विचार करते हैं। अमरकोष में वन के पर्यायवाची शब्दों में छह नाम आए हैं, जिनमें अरण्य शब्द का समावेश किया गया है।1 अमरकोेश में ही अरण्य शब्द का प्रयोग नपुंसक लिंग में होना चाहिए, यह बताने के लिए एक कारिका है।2

निघण्टु में आरण्य की पत्नी के लिए अरण्यानी शब्द का समावेश किया गया है।3 इस प्रसंग में यास्क ने अरण्य शब्द का निर्वचन दिया है। यास्क के अनुसार ऐसा स्थान जो ग्राम से दूर होता है

  1. अटव्यरण्यं विपिनं गहनं काननं वनम् (अमरकोश 2.4.1)।

  2. खम्, अरण्यम्, पर्णम्, श्वभ्रम्, हिमम्, उदकम् शीतम्, उष्णम्, मांसस्, रूधिरम्, मुखम्, अक्षि, द्रविणम् तथा बलम्, द्विहीनेऽन्यच्च खारण्यपर्णश्वभ्रहिमोदकम्। शीतोष्ण

मांसरूधिर-मुखाक्षिद्रविणं बलम् (अमरकोश 3.5.22)। अर्थात् खम्, अरण्यम्, पर्णम्, श्वभ्रम्, हिमम्, उदकम्, शीतम्, उष्णम्, मांसम्, रूधिरम्, मुखम्, अक्षि, द्रविणम् तथा बलम्, ये चैदह शब्द नपुंसकलिंग में हैं।

  1. ओषधयः। रात्रिः। अरण्यानी। श्रद्धा। पृथ्वी इत्यादि (निघण्टु 5.3.24.)। देवराज यज्वाने अरण्यान्यरण्यानि (ऋग्वेद 8.8.4.1) मन्त्र प्रस्तुत किया जिस पर यास्क ने इस मन्त्र में आये हुए अरण्यानी शब्द को लेकर अरण्य शब्द का निर्वचन प्रस्तुत किया (निरूक्त 1.30)।

 

अथवा जो रमण करने के योग्य नहीं होता उसे अरण्य कहते हैं।4 संस्कृतकोशकारों ने भी अरण्य शब्द की व्युत्पत्ति दी है। वह स्थान जहाँ (विचरण करने के लिए) हिरन जाते हैं।5 शेष आयु बिताने के लिए जहाँ जाया जाता है, वह अरण्य है।6 ऐसा प्रतीत होता है कि अरण्य में रहना है तो वहाँ सुख की कामना का कोई प्रश्न नहीं है। इसीलिए तप करने के लिए अरण्य जाने की प्राचीन परम्परा रही है। चाणक्यशतकम् के एक श्लोक में कहा गया है कि जिस घर में माँ न हो, पत्नी कटुवचन बोलने वाली हो, उसे (तप करने के लिए)

अरण्य चले जाना चाहिए।7 यह भारत भूमि है जिसका एक-एक कण पवित्र माना गया है, चाहे वे नदियाँ8 हों, चाहे क्षेत्र9 हों, चाहे सरोवर10 हों।

  1. अरण्यमपार्णं ग्रामात्। अरमणं भवतीति वा (निरूक्त 1.30)।

  2. अर्यते मृगैः- वनम् (शब्दकल्पद्रुमकोश, पहला खण्ड, पृष्ठ सं0 13)।

  3. अर्यते गम्यते शेषे वयसि – अरण्य (च्तंबजपबंस ैंदेातपज.म्दहसपेी क्पबजपवदंतलए चण् 215)।

  4. माता यस्य गृहे नास्ति भार्या चाप्रियवादिनी। अरण्यं तेन गन्तव्यं यथारण्यं तथा गृहम् (चाणक्यशतकम् श्लोक 44)।

  5. सात नदियाँ पुण्यदायक मानी गई हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं-गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, कावेरी, नर्मदा तथा सिन्धु (द्र0 तीर्थांक, पृष्ठ 531)।

  6. ये सात क्षेत्र हैं, जो पुण्यदायक हैं, यथा-कुरूक्षेत्र (पंजाब), हरिहरक्षेत्र (सोनपुर), प्रभासक्षेत्र (वेरालळ), रेणुकाक्षेत्र (मथुरा के पास), भृगक्षेत्र (भरुच), पुरुषोत्तमक्षेत्र (जगन्नाथपुरी), तथा सूकरक्षेत्र (सोरों), (द्र0 तीर्थांक, पृष्ठ 531)।

  7. इन सरोवरों की संख्या पाँच हैं, जो पुण्यदायक हैं-बिन्दुसरोवर (सिद्धपुर), नारायणसरोवर (कच्छ), पम्पासरोवर (मैसूरराज्य), पुष्करसरोवर (राजस्थान) तथा मानसरोवर (तिब्बत) (द्र0 तीर्थांक, पृष्ठ 531)।

इसी क्रम में अरण्य भी आते हैं। कहीं-कहीं ऐसा उल्लेख है कि सम्पूर्ण भारतभूमि में नौ अरण्य हैं, जो मोक्षदायक हैं। इनमें नैमिषारण्य भी एक है, यथा – दण्डकारण्य, सैन्धवारण्य, जम्बूमार्ग, पुष्करारण्य, उत्पलावर्तकारण्य, नैमिषारण्य, कुरूजांगल, हिमवदरण्य तथा अर्बुदारण्य।11

कैसे नैमिषारण्य की उत्पत्ति हुई तथा किस प्रकार उसका नाम नैमिषारण्य हुआ, इससे सम्बंधित अनेक प्रसंग पुराण इत्यादि ग्रन्थों में आए हैं। वराहपुराण में कहा गया है कि गौरमुख मुनि के कहने पर भगवान् विष्णु ने सुदर्शनचक्र को दुर्जय की सेना पर चलाया, जिससे सुदर्शनचक्र द्वारा पलक झपकते-झपकते दुर्जय की आसुरी सेना भस्म कर दी गई। उस समय विष्णु ने गौरमुख से कहा कि निमेषमात्र में दानवी सेना इस अरण्य में मारी गई है अतः इस अर्थ के अनुरूप इस अरण्य का नाम नैमिषारण्य होगा।

यह विशेष रूप से ब्राह्यणों का निवास स्थान रहेगा।12 कूर्मपुराण के अनुसार ब्रह्या द्वारा दिए गए चक्र का परिधिभाग (नेमि) जहाँ टूटकर गिरा,

  1. दण्डकारण्यं सैन्धवारण्यं जम्बुमार्गं च पुष्करम्। उत्पलावर्त्तकारण्यं नैमिषं कुरुजांगलम्। हिमवानर्बुदश्चैव नवारण्यं विमुक्तिदम् (द्र0 शब्दकल्पद्रुमकोश, पहला खण्ड, पृष्ठ सं0 13)।

  2. एवं कृत्वा ततो देवो मुनिं गौरमुखं तदा। उवाच निमिषेणेदं निहतं दानव बलम्। अरण्येऽस्मिंस्ततस्त्वेवं नैमिषारण्यसंज्ञितम्। भविष्यति यथार्थं वै ब्राह्मणानां विशेषतः (वराहपुराण 11.108-101)।

 

उस स्थान को नैमिषारण्य कहा गया।13 शिवपुराण के अनुसार भगवान् ब्रह्या ने मुनियों से कहा कि यह मेरे द्वारा बनाया गया मनोमय चक्र है, इसे मैं छोड़ता हूँं। जहाँ नेमि टूटेगी उस देश को तपस्या के योग्य समझना। वे ब्राह्मण भी ब्रह्मा को प्रणाम करके चक्र के पीछे-पीछे चले।

वह फंेका हुआ चक्र एक चिकने पत्थर पर जा पड़ा, फिर वह किसी वन में निर्मल जल में गिर गया। उसके कारण मुनियों द्वारा पूजित वह वन नैमिष नाम से प्रसिद्ध हुआ।14 यहीं पर ब्रह्मा जी ने मुनियांे को एक हज़ार दिव्य वर्षों तक चलने वाले यज्ञ के अनुष्ठान का आदेश दिया।15 इसी तरह के प्रसंग अन्य पुराणों में भी आए हैं।16

  1. तस्य वै व्रजतः क्षिप्रं यत्र नेमिरशीर्यत। नैमिशं तत्स्मृतं नाम्ना पुण्यं सर्वत्र पूजितम् (कूर्मपुराण 2.41.8)।

  2. एतन्मनोमयं चक्रं मया सृष्टं विसृज्यते। यत्रास्य शीर्यते नेमिः स देशस्तपसः शुभः। तेऽपि हृष्टतरा विप्राः प्रणम्य जगतां प्रभुम्। प्रययुस्तस्य चक्रस्य यत्र नेमिरशीर्यत। चक्रं तदपि संक्षिप्तं श्लक्ष्णं चारूशिलातले। विमलस्वादुपानीये निपपात वने क्वचित्। तद्वनं तेन विख्यातं नैमिषं मुनिपूजितम् (शिवपुराणवायवीयसंहितापूर्वभाग 3.53.-56)।

  3. दीर्घसत्रसमारब्धं दिव्यवर्षसहस्त्रकम् (शिवपुराणवायवीय संहितापूर्वभाग 3.48)।

  4. गच्छतस्तस्य चक्रस्य यत्र नेमिर्विशीर्यते। पुण्यः स देशो मन्तव्यः प्रत्युवाच तदा प्रभुः (ब्रह्माण्डपुराण 1.1.1.158)। गच्छतो धर्मचक्रस्य यत्र नेमिर्विशीर्यते। पुण्यः स देशो मन्तव्यः इत्युवाच तदा प्रभुः (वायुपुराण 1.1.1.183)।

 

नैमिषारण्य के प्रसंग में यदि हम पुराणवाड्.मय की ओर दृष्टिपात करते हैं तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि अनेक-अनेक का वाचन ऋषियों की प्रार्थना पर सूतजी के द्वारा तथा उग्रश्रवा के द्वारा किया गया। वास्तव में ऋषियों और मुनियांे की इस बलवती इच्छा के परिणामस्वरूप ब्रह्मा के द्वारा एक पवित्र तीर्थ की सृष्टि की गई जहाँ अनेक-अनेक दीर्घकालीन यज्ञ किए जा सकें और उन यज्ञानुष्ठानों के बीच में समय मिलने पर ऋषि और मुनि भगवान् व्यास द्वारा रचित पुराणसंहिताओं का श्रवण एवं वाचन कर सकें।

लिंग पुराण के प्रारम्भ में ही यह प्रसंग आता है कि मुनि नारद शैलेश, संगमेश्वर, हिरण्यगर्भ, स्वर्लीन, अविमुक्त, महालय, रौद्र, गोप्रेक्षक, पाशुपत, विघ्नेश्वर, केदार, गोमायुकेश्वर, हिरण्यगर्भ, चन्द्रेश, ईशान्य, त्रिविष्टप् तथा शुक्रेश्वर आदि तीर्थस्थानों में भगवान् शंकर की यथोचित आराधना करके नैमिषारण्य पहुँचते हैं।17 वहाँ रह रहे ऋषियों से पूजित होकर लिंगमाहात्म्य से सम्बंधित विचित्र रहस्यों वाली कथाएँ सुनाने लगते हैं।18 इसी बीच मुनिवर सूतजी आते हैं।

  1. नारदोभ्यच्र्य शैलेश शंकरं संगमेश्वरे। हिरण्यगर्भे स्वर्लीने ह्यविमुक्तये महालये। रौद्रे गोप्रेक्ष के चैव श्रेष्ठे पाशुपते तथा। विघ्नेश्वरे केदारे तथा गोमायुकेश्वरे। हिरण्यगर्भे चन्द्रेशे ईशान्ये च त्रिविष्टपे। शुक्रेश्वरे यथान्यायं नैमिषं प्रययौ मुनिः (लिंगपुराण 1.1. 2-4)।

  2. चक्रे कथां विचित्रार्थां लिंगमाहात्म्यमाश्रिताम् (लिंगपुराण 1.1.7)।

 

ऋषियों द्वारा उनसे प्रार्थना करने पर वे महादेव आदि का स्मरण करके लिंगपुराण को कहना प्रारम्भ करते हैं।19 उस प्रकार लिंगपुराण का प्राकट्य हुआ।

योगशास्त्र के सूर्य मुनिवर गर्ग नैमिषारण्य पहँुचते हैं तथा शौनक जी से पूजित होकर उनके प्रश्न के उत्तर में श्री गर्गसंहिता का कथन करते हैं।20 उग्रश्रवा21 से एक बार नैमिषारण्य में शौनक22 जी ने यह बात कही कि आपने कुरुवंशियों के ही जन्म का विशेष रूप से वर्णन किया किन्तु वृष्णि तथा अन्धकवंश के वीरों के जन्म का वृत्तान्त नहीं कहा। अब आप उन सबके जन्म-कर्म का भी वर्णन कीजिए।

  1. नमस्कृत्य महादेवं ब्रह्माणं च जनार्दनं। मुनीश्वरं तथा व्यासं वक्तुं लिंग स्मराम्यहम् (लिंगपुराण 1.1.18)।

  2. गर्गसंहिता, गोलोकखण्ड (1.4-11)।

  3. लोमहर्षण सूत के पुत्र ही उग्रश्रवा हैं।

  4. रूरु (प्रमद्वरा) के पुत्र शुनक और उनके पुत्र शौनक। इन्होंने ही नैमिषारण्य में द्वादशवर्षीय सत्र, दीर्घसत्र तथा सहस्त्रवार्षिक सत्र का अनुष्ठान किया। इन्हीं को कुलपति भी कहा गया क्योंकि इनके आश्रम में दस हज़ार तपस्वियों के खान-पान आदि की व्यवस्था रहती थी। कहा भी गया है-मुनीनां दशसाहस्त्रं योऽन्नदानादिपोषणात्।अध्यापयति विप्रर्षिः स वै कुलपतिः स्मृतः (द्र0 शब्दकल्पद्रुमकोश, दूसरा खण्ड, पृष्ठ सं0 153)।

 

इसी जिज्ञासा के फलस्वरूप हरिवंशपुराण23 का कथन नैमिषारण्य में हुआ।24 उग्रश्रवा (सौति) जिस समय तीर्थाें-धर्मों तथा समन्तपंचक कुरुक्षे़त्र की यात्रा करते हुए नैमिषारण्य पहुँचे, उस समय शौनक जी के द्वारा वहाँ द्वादशवर्षीय सत्र चल रहा था। वहीं पर ऋषियों के द्वारा प्रार्थना करने पर उग्रश्रवा ने एक लाख श्लोकों में निबद्ध25 व्यास द्वारा रचित महाभारत नामक महाकाव्य का वाचन किया।26

श्रीमद्भागवत के तो प्रारम्भ में ही नैमिषारण्य का उल्लेख है। श्रीमद्भागवत के अनुसार विष्णु को प्रिय इसी नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि ऋषियों ने एक हज़ार वर्ष तक चलने वाले सत्र को सम्पन्न

  1. यह पुराण महाभारत ग्रन्थ का अन्तिम पर्व है। आदिपर्व के अनुक्रमणिकाध्याय में महाभारत को सौ पर्वों वाला ग्रन्थ बतलाया गया। उसके अन्तिम तीन पर्व इस हरिवंश ग्रन्थ में सम्मिलित हैं। यह बात अनुक्रमणिकाध्याय में स्पष्ट रूप सें निर्दिष्ट है- हरिवंशस्ततः पर्व पुराणं खिलसंज्ञितम्। विष्णुपर्व शिशोश्चर्या विष्णोंः कंसवधस्तथा। भविष्यं पर्व चाप्युक्तं खिलेष्वेवाद्भुतं महत्। एतत्पर्वशतं पूर्णं व्यासेनोक्तं महात्मना (महाभारत, आदिपर्व 2.82-83)।

  2. तत्र जन्म कुरूणां वै त्वयोक्तं लौमहर्षणे। न तु वृष्ण्यन्धकानां च तद् भवान् वक्तुमर्हति (हरिवंशपुराण हरिवंशपर्व 1.17)।

  3. इदं शतसहस्त्रं तु लोकानां पुण्यकर्मणाम्। उपाख्यानैः सह ज्ञेयमाद्यं भारतमुत्तमम् (महाभारतआदिपर्व 1.101)।

  4. गन्धर्वयक्षरक्षांसि श्रावयामास वै शुकः। अस्मिंस्तु मानुषे लोके वैशम्पासत उक्तवान्।। शिष्यो व्यासस्य धर्मात्मा सर्ववेदविंदा वरः। एकं शतसहस्त्रं तु मयोक्तं वै निबोधत (महाभारत आदिपर्व 1.108-101)।

 

किया।27 इसी अवसर पर सूतजी आए और उनके द्वारा श्रीमद्भागवत पुराण का वाचन किया गया।28 दीर्घसत्र की समाप्ति के बाद प्रार्थना करने पर इसी नैमिषारण्यतीर्थ में सूत ने दीर्घसंहिता (मत्स्यपुराण) को सुनाया था।29

पुराणों में जिन विषयों का वर्णन किया गया है, उन विषयों में तीर्थ का प्रसंग अवश्य आता है। यह एक प्राचीन परम्परा है कि जब किसी विषय का महŸव बतलाया जाता है तो उसके विषय की महŸाा का वर्णन उसके चरम रूप में किया जाता है। पुराण इत्यादि आर्षग्रन्थों में जब किसी तीर्थ की महŸाा का वर्णन किया जा रहा होता है तो उस प्रंसग में अनेक-अनेक जगह किसी न किसी व्याज से नैमिषारण्य का उल्लेख होता है।

उदाहरण के लिए वराहपुराण में जब कोकातीर्थ की महत्ता का प्रसंग आता है तब पृथ्वी विष्णु को कहती है कि आप चक्र, वाराणसी, भद्रकर्णह्नद तथा नैमिषारण्य जैसे तीर्थ को छोड़कर कोकातीर्थ की ही

  1. नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्त्रसममासत (श्रीमद्भागवत 1.1)।

  2. इति सम्प्रश्नसंहृष्टो विप्राणां लौमहर्षणिः। प्रतिपूज्य वचस्तेषां प्रवक्तुमुपचक्रमे। श्रीमद्भागवत 2.1)।

  3. सूतमेकाग्रमासीनं नैमिषारण्यवासिनः। मुनयो दीर्घसत्रान्ते पप्रच्छर्दीर्घसंहिताम् (मत्स्यपुराण 1.5)।

 

क्यों प्रशंसा करते हैं।30 इस अवसर पर भगवान् विष्णु कहते हैं कि ये नैमिषारण्य आदि सभी तीर्थ भगवान् रुद्र के आश्रित हैं तथा श्रेष्ठ पाशुपात तीर्थ हैं।31

मथुरामाहात्म्य के प्रसंग में पृथ्वी ने वारह से प्रश्न किया कि इन तीर्थों को छोड़कर मथुरा का गुणगान क्यों करते हैं। उस समय पृथ्वी ने जिन तीन तीर्थों का उल्लेख किया, उसमें नैमिषारण्य का नाम लिया।32

वराहपुराण में शैलेश्वर तीर्थ को जिन अन्य तीर्थों से अति विशिष्ट कहा गया उन तीर्थों में प्रभास, प्रयाग, पुष्कर और कुरुक्षेत्र तीर्थों के साथ नैमिषारण्य तीर्थ के नाम का भी उल्लेख किया गया।33  वराहपुराण के श्रवण का माहात्म्य वर्णित किया गया है।

  1. चक्रं वाराणसी चैव अट्टहासं च नैमिषम्। भद्रकर्णह्नदं चैव कोका वै किं प्रशंससि (वराहपु0 121.12)।

  2. एते रुद्राश्रिताः क्षेत्रा ये त्वया परिकीर्र्त्तिताः। एते पाशुपताः श्रेष्ठा कोका भागवतस्य च (वराहपु0 121.18)।

  3. पुष्करं नैमिषं चैव पुरीं वाराणसीं तथा। एतान् हित्वा महाभाग मथुरां कि प्रशंसति (वारहपु0 150.10)।

  4. प्रभासाच्च प्रयागाच्च नैमिषाद् पुष्करादपि। कुरुक्षेत्रादपि बुधाः क्षेत्रमेतद् विशिष्यते (वराहपु0 213.51)।

 

इस अवसर पर जिन तीर्थों से करोड़ों गुणा फल वराहपुराण को सुनने से प्राप्त होता है उन तीर्थों में नैमिषारण्य तीर्थ का नाम आता है।34 मत्स्यपुराण में दक्ष द्वारा किए गए यज्ञानुष्ठान के अवसर पर सती अपने पिता की प्रार्थना पर देवी के 108 नामों के स्तोत्र का कथन करती हैं और वे देवियाँ जिन तीर्थों मे स्थित हैं साथ में उन तीर्थों का भी उल्लेख करती हैं। अतः इस स्तोत्र में सती ने पहले नम्बर पर वाराणसी का तथा वहाँ पर स्थित विशालाक्षी देवी का उल्लेख किया और दूसरे नम्बर पर नैमिषारण्य का तथा वहाँ पर स्थित लिंगधारिणी देवी का उल्लेख किया।35

नैमिषारण्य सहस्त्रों-सहस्त्रों ऋषियों-मुनियों की तपःस्थली रही है अतः पुराणों में अनेक विशिष्टजनों के आने और वहाँ उनके द्वारा अनेक धार्मिक कृत्य किए जाने का उल्लेख मिलता है तथा

पुराणों में नैमिषारण्य से सम्बंधित धर्मशास्त्रीय कुछ विशेष विषयों का भी उल्लेख प्राप्त होता है। वराहपुराण में आया है कि अश्वशिरा राजा पुत्र को राज्य सौंपकर इसी नैमिषारण्य क्षेत्र में आया और वहाँ यज्ञमूर्त्ति भगवान् विष्णु की स्तुति की।36

  1. प्रयागे ब्रह्मतीर्थेे च तीर्थे चामरकण्टके। यत् पुण्यफलमाप्नोति तत् कोटिगुणितं भवेत् (वराहपु0 215.12)।

  2. वाराणस्यां विशालाक्षी नैमिषे लिंगधारिणी (मत्स्यपुराण 13.26)।

  3. ज्येष्ठं पुत्रं समाहूय धन्यं स्थूलशिराहव्यम्। अभिषिच्य निजे राज्ये स राजा प्रययौ वनम्। नैमिषारण्यं। वरारोहे तत्र यज्ञतनुं गुरुम्। तपसाराधयामास यज्ञमूर्त्ति स्तवेन च (वराहपु0 5.43-44)।

 

विश्वकर्मा की रूपयौवन सम्पन्न साध्वी कन्या चित्रांगदा का उल्लेख वामनपुराण में किया गया है, जो स्नान करने के लिए नैमिषारण्य आई। स्नान करने के लिए जैसे ही जल में उतरी, उसी समय सुदेव के पुत्र सुरथ चित्रांगदा को देखकर काममोहित हो गए।37 चित्रांगदा भी अपने आपको नहीं सँभाल पाई और सखियों के मना करने पर भी उसने अपने आपको राजा के प्रति अर्पित कर दिया।38 श्रीमद्भागवत में यह प्रसंग आता है कि कौरवों तथा पाण्डवों, दोनों से तटस्थ रहने के बहाने बलराम तीर्थयात्रा पर चले गए। तीर्थयात्रा करते हुए बलराम नैमिषारण्य पहुँचे, जहाँ ऋषिगण दीर्घकाल तक चलने वाले सत्र का अनुष्ठान कर रहे थे।39

वामनपुराण में यह अद्भुत प्रसंग आया है कि जब नाग के द्वारा च्यवन ऋषि को पाताल धकेल दिया गया तो वहाँ उनकी भेंट प्रह्लाद से हुई। वहाँ प्रह्लाद ने च्यवन से प्रश्न किया कि कृपया मुझे यह बतलाइए कि पृथ्वी, आकाश और पाताल में कौन-कौन से तीर्थ हैं?40

  1. सा स्नातुमवतीर्णा च अथाभ्यागान्नरेश्वरः। सुदेव तनयो धीमान् सुरथो नाम नामतः। तां ददर्श च तन्वंगी शुभांगो मदनातुरः (वामनपुराण 37.41)।

  2. वार्यमाणा सखीभिस्तु प्रादादात्मानमात्मना (वामनपुराण 37.41)।

  3. जगाम नैमिषं यत्र ऋषयः सत्रमासते (श्रीमद्भागवत 10.78.20)।

  4. भगवन् कानि तीर्थानि पृथिव्यां कानि चाम्बरे। रसातले च कानि स्युरेतद् वक्तुं ममार्हसि (वामनपुराण 7.36)।

 

च्यवन ने एक ही श्लोक में इस प्रश्न का उŸार देते हुए कहा कि हे महाबाहो! पृथ्वी में नैमिष, अन्तरिक्ष में पुष्कर और रसातल में चक्रतीर्थ प्रसिद्ध हैं।41 च्यवन ऋषि से ही प्रेरणा प्राप्त करके प्रह्लाद तीर्थों की यात्रा करते हुए नैमिषारण्य आए और वहाँ नैमिषारण्य में पहुँचकर प्रह्लाद ने गोमती, का॰चनाक्षी और गुरुदा के मध्य में स्थित तीस हज़ार पापनाशक तीर्थों में स्नान किया, अच्युत की पूजा की, नैमिषारण्यवासी ऋषियों की पूजा की तथा देवाधिदेव महेश का विधिपूूर्वक अर्चन किया।42

मनु-शतरूपा की तपस्या के कारण ही ब्रह्म को राम का अवतार धारण करना पड़ा। इस प्रसंग में तुलसीदास ने नैमिषारण्य में मनु-शतरूपा के तप का वर्णन किया। मानसपीयूष नामक ग्रन्थ में यह प्रश्न उठाया गया है कि मनु ने नैमिषारण्य की ही यात्रा क्यों की। उसका उत्तर इस प्रकार दिया गया कि तप के लिए कृतयुग (सत्ययुग) में नैमिषारण्य तीर्थ की ही प्रधानता है।43

    41. पृथिव्यां नैमिषं तीर्थमन्तरिक्षे च पुष्करम्। चक्रतीर्थं महाबाहो रसातलतले विदुः (वामनपुराण 7.37)।

  1. तत्र तीर्थसहस्त्राणि त्रिंशत्पापहराणि च। गोमत्याः कचनाक्ष्याश्च गुरुदायाश्च मध्यतः।। तेषु स्नात्वाच्र्य देेवेशं पीतवाससमच्युतम्। ऋषीनपि च संपूज्य नैमिषारण्यवासिनः।। देवदेवं तथेशानं संपूज्य विधिना ततः (वामनपुराण 47.2-3)।

  2. कृते तु नैमिषं तीर्थं त्रेतायां पुष्करं वरम्। द्वापरे तु कुरूक्षेत्रं कलौ गंगा विशिष्यते (द्र0 मानसपीयूष, खण्ड 2, पृष्ठ 712)।

 

इसीलिए मनु-शतरूपा ने कठोर तप करने के नैमिषारण्य जैसे दिव्य तीर्थ का चयन किया।

श्राद्धपक्ष में जिन नदियों में स्नान करके तथा स्नान के बाद श्राद्ध करने से अशुभों का नाश होता है उनमें नैमिषारण्य की गौतमी नदी का भी उल्लेख मिलता है।44 वराहपुराण में विशेष तीर्थों में विशेष तिथियों में स्नान करने का प्रसंग है। इस अवसर पर त्रयोदशी तिथि को नैमिषारण्य में स्नान करने का विशेष फल बताया गया।45

शिवपुराण में कहा गया है कि नैमिषारण्य तथा बदरिकाश्रम में सूर्य और बृहस्पति के मेषराशि में आने पर यदि स्नान किया जाय तो उस समय वहाँ किए जाने वाले स्नान-पूजन आदि से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।46 वामनपुराण के अनुसार भरद्वाज और वामन के प्रश्नोत्तर के रूप में यह विषय स्पष्ट हुआ कि वामन भगवान् नैमिषारण्य में पीतवासा नाम से नित्य स्थित हैं।47

44. गंगासरयूमथवा विपाशां सरस्वतीं नैमिषगोमतीं वा। ततोऽवगाह्यार्चनमादरेण कृत्वा पितृणामहितानि हन्ति (वराहपु0 13-48)।

45. एकादश्यां च विश्रान्तौ द्वादश्यां सौकरे तथा। त्रयोदश्यां नैमिषे च प्रयागे च चतुर्दशीम्। कार्तिकस्य पुष्करे चैव कार्तिकस्य सितासिते। कालेष्वेषु नरः स्नात्वा सर्वपापं व्यपोहति। (वराहपु0 174.56-57)।

  1. शिवपुराण विद्येश्वरसंहिता, अध्याय 12

  2. केषु केषु विभो नित्यं स्थानेषु पुरुषोत्तम । सान्निध्यं भवतो ब्रूहि ज्ञातुमिच्छसि तŸवतः (वामनपुराण 62.55) भृगुतुंगे सुवर्णाक्षं नैमिषे पीतवाससम् (वामनपुराण 63.1)।

 

नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषि प्रश्नोत्तर के रूप में अनेक आध्यात्मिक-धार्मिक विषयों पर विचार-विमर्श भी करते थे। वामनपुराण में एक प्रसंग आता है, जब शौनक आदि मुनियों ने पौराणिक महात्मा लोमहर्षण से पूछा कि सन्मार्ग में चलने वाले हम लोगों को यज्ञ का फल कैसे प्राप्त होगा?48 इस प्रश्न के उत्तर में लोमहर्षण का कहना है कि जहाँ सरस्वती नदी अवस्थित हैं, वहाँ यज्ञ का महान् फल होता है।49 ऐसा तीर्थक्षेत्र जिसका प्राकट्य भगवान् ब्रह्मा की प्रेरणा से हुआ और जहाँ 88 हज़ार ऋषि शौनक आदि मुनियों के साथ रह रहे हों, जहाँ समस्त पुराणसंहिताओं का वाचन एवं श्रवण किया गया हो, तपस्या की दृष्टि से सत्ययुग में जो विशेष रूप से फलदायी रहा हो।

मनुष्य, देव-दानव योनियों में उत्पन्न विशिष्टजनों ने आकर जहाँ स्नान आदि तथा अन्य यज्ञादि धार्मिक अनुष्ठान करके अपने मुक्ति के मार्ग को प्रशस्त किया हो, ऐसे नैमिषारण्य तीर्थ के माहात्म्य का वर्णन होना स्वाभाविक ही है। उदाहरण के लिए महाभारत के वनपर्व के अन्तर्गत भीष्म के

द्वारा प्रश्न करने पर पुलस्त्य अनेक तीर्थों की महिमा का वर्णन करने के साथ ही नैमिषारण्य के माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि नैमिषारण्य सिद्धों से सेवित तथा पुण्यमय है। वहाँ देवताओं के साथ ब्रह्मा जी नित्य निवास करते हैं।

  1. कथं यज्ञफलोऽस्माकं वर्ततां सत्पथे भवेत् (वामनपुराण, सरोमाहात्म्यम् 16.25)।

  2. सरस्वती स्थिता यत्र तत्र यज्ञफलं महत् (वामनपुराण, सरोमाहात्म्यम् 16.26)।

 

आधा पाप तो उसे खोजने में नष्ट हो जाता है और समस्त पाप उसमें प्रवेश करते ही नष्ट हो जाते हैं। (इस अवसर पर कहा कि) एक मास तक नैमिष में निवास करना चाहिए।पृथ्वी पर जितने तीर्थ हैं, वे सभी नैमिष में विद्यमान हैं।

स्नान करके नियम के साथ जो नियमित भोजन करता है, उसे गोमेधयज्ञ का फल मिलता है। अपने कुल की सात पीढ़ियों का वह उद्धार कर देता है। उपवास करते हुए जो नैमिष में प्राणत्याग कर देता है, वह सब लोकों में आनन्द का अनुभव करता है। ऐसा मनीषी पुरुषों का कथन है।

नैमिष तीर्थ नित्य पवित्र और पुण्यजनक है।50 तुलसीदास ने अपने रामचरितमानस में नैमिषारण्य को तीर्थाें में श्रेष्ठ, अत्यन्त पवित्र तथा साधकों को सिद्ध कर देने वाला बताया और कहा कि वहाँ मुनियों और सिद्धों के समाज के समाज बसते हैं।51

  1. ततस्तु नैमिषं गच्छेत् पुण्यं सिद्धनिषेवितम्। तत्र नित्यं निवसति ब्रह्मा देवगणैः सह।। नैमिषं मृगयानस्य पापस्यार्द्धं प्रणश्यति। प्रविष्टमात्रस्तु नरः सर्वपापैः प्रमुच्यते।। तत्र मासं वसेद् धीरो नैमिषे तीर्थतत्परः। पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि नैमिषे। कृताभिषेकस्तत्रैव नियतो नियताशनः। गवां मेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति भारत। पुनात्यासप्तमं चैव कुलं भरतसत्रम। यस्त्यजेन्नैमिषे प्राणानुपवासपरायणः। स मोदेत् सर्वलोकेषु एवमाहुर्मनीषिणः। नित्यं मेध्यं च पुण्यं च नैमिषं नृपसत्तम। (महाभारतवनपर्व 84.59-64)।

  2. तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता। बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा (रामचरितमानस, बालकाण्ड 143.1-3)।

 

नारायण दत्त शर्मा

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